Tuesday, 8 July 2014

सोऽह्म्


    उस अन्तिम एकत्व के ज्ञान के बाद उस विज्ञान को और भी नूतन सिद्धांतों के अविष्कार की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। धार्मिक क्षेत्र में उस मौलिक एकत्व का ज्ञान तो बहुत पहले हो चुका है। अब धर्मों के समक्ष जो काम है, वह है उस इकाई की विभिन्न अभिव्यक्तियों का पता लगाना।

    उदाहरण के लिए हम किसी भी विज्ञान को लें, जैसे रसायनशास्त्र को। मान लो कि ऐसे तत्व का पता चल जाये, जिससे सभी तत्वों का निर्माण हो सकता है। तब तो रसायनशास्त्र अपने चरम विकास पर पहुँच जायेगा और उसके सामने बस इतना ही काम शेष रह जायेगा कि वह देखे कि किस तत्व की कितनी अभिव्यक्तियाँ हैं और जीवन में उनका क्या उपयोग है, ठीक यही बात धर्म के मामले में भी है।

    युगों पूर्व धर्म के विराट मौलिक तत्वों का पता चल गया, उसके क्षेत्र तथा उसकी योजना का ज्ञान प्राप्त हो गया। यह सब तभी हो गया जब मनुष्य ने वेदों में उल्लिखित तथाकथित 'अन्तिम शब्द' - सोअ्हं - को पा लिया अर्थात् इस सत्य को समझ लिया को जड-चेतनमय विश्व में एक ही सत्ता व्याप्त है, चाहे उसे आप 'गौड' कहें अथवा ब्रह्म, अल्लाह कहों अथवा जिहोवा। मनुष्य इस सत्य की अनुभूति के आगे नहीं जा सकता। सौभाग्य से हमारे लिए बस इतना ही शेष है कि इसका अपने जीवन में उपयोग करें। हमें वह काम करना है, जिसके प्रत्येक मनुष्य दृष्टा बन जाये। सचमुच हमारे सामने एक महान कार्य है।

    पहले जमाने में लोगों को यह पता ही नहीं था कि पैगम्बर का अर्थ क्या होता है। वे सोचते थे कि संयोग से ही कोई व्यक्ति दैवीकृपा अथवा असाधारण प्रतिभा का भागी बनता है और उसके बल पर उत्कृष्ट ज्ञान प्राप्त कर लेता है। आज तो हम यह सिद्ध करने के लिए तैयार हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को इस उत्कृष्ट ज्ञान को प्राप्त करने का जन्मसिद्ध अधिकार है - इस विश्व में मात्र संयोग से कुछ नहीं होता। जिस व्यक्ति के बारे में हम सोचते हैं कि संयोग से उसने अमुक्त चीज प्राप्त कर ली है, वह व्यक्ति वस्तुतः युगों से उसकी प्राप्ति के लिए सतत् प्रयत्न करता रहा है। इस तरह सारी समस्या का रूप यहा हो जाता है क्या सचमुच हम पैगम्बर बनना चाहते हैं? अगर हाँ, तो हम बनकर रहेंगे।

    उन्होंने आगे कहा "इस तरह पैगम्बर बनाने का महान कार्य हमारे सम्मुख पडा है। सभी महत्वपूर्ण धर्म जाने-अनजाने इसी उद्देश्य की ओेर अग्रसर हो रहे हैं।"


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मुक्तसंग्ङोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।
सिद्ध‌‌यसिद्धयोर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥१८.२६॥
Freed from attachment, non-egoistic, endowed with courage and enthusiasm and unperturbed by success or failure, the worker is known as a pure (Sattvika) one. Four outstanding and essential qualities of a worker. - Bhagwad Gita : XVIII-26