Monday, 21 July 2014

वेदान्त को एक जीवन सिद्धान्त कैसे बनाया जाय?


            प्रश्न- वेदान्त के लक्ष्य तक कैसे पहँचा जा सकता है      

            उत्तर- श्रवण, मनन और निदिध्यासन द्वारा। किसी गुरू से ही श्रवण करना चाहिए। चाहे कोई नियमित रूप से शिष्य हुआ हो, पर अगर जिज्ञासु सुपात्र है और वह सद्गुरू के शब्दों का श्रवण करता है, तो उसकी मुक्ति हो जाती है।

 

            प्रश्न- सद्गुरू कौन है?

            उत्तर- सद्गुरू वह है, जिसे गुरू परम्परा से आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त हुई है। अध्यात्म गुरू का कार्य बडा कठिन है। दूसरों के पापों को स्वयं अपने ऊपर लेना पडता है। कम समुन्नत व्यक्तियों के पतन की पूरी आशंका रहती है। यदि शारीरिक पीडा मात्र हो, तो उसे अपने को भाग्यवान समझना चाहिए।

 

            प्रश्न- क्या अध्यात्म गुरू, जिज्ञासु को सुपात्र नहीं बना सकता?

            उत्तर- कोई अवतार बना सकता है। साधारण गुरू नहीं।

 

            प्रश्न- क्या मोक्ष का कोई सरल मार्ग नहीं है?

            उत्तर- 'प्रेम को पंथ कृपाण की धारा' - केवल उन लोगों के लिए आसान है। जिन्हें किसी अवतार के सम्पर्क में आने का सौभाग्य प्राप्त हुआ हो। परमहंस देव कहा करते थे, "जिसका यह आखिरी जन्म है, वह किसी किसी प्रकार से मेरा दर्शन कर लेगा।"

 

            प्रश्न- क्या उसके लिए योग्य सुगम मार्ग नहीं है?

            उत्तर- (मजाक में) आपने खूब कहा, समझा! -योग्य सुगम मार्ग! यदि आपका मन निर्मल होगा और आप योगमार्ग पर आरूढ होंगे, तो आपको कुछ अलौकिक सिद्धियाँ मिल जायेंगी, परन्तु वे रुकावटे होंगी। इसलिए मन की निर्मलता प्रथम आवश्यक है।

 

            प्रश्न- इसका उपाय क्या है?

            उत्तर- सुकृत द्वारा। सुकृत दो प्रकार के हैं: सकारात्मक और नकारात्मक। 'चोरी मत करो'- यह नकारात्मक निर्देश है, 'परोपकार करो'- यह सकारात्मक है।    

 

            प्रश्न- परोपकार उच्च अवस्था में क्यों किया जाये, क्योंकि निम्न अवस्था में वैसा करने से साधक भवभन्जन में पड सकता है?

            उत्तर- प्रथम अवस्था में ही इसे करना चाहिए। आरम्भ में जिसे कोई कामना रहती है, वह भ्रांत होता है और बन्धन में पडता है, अन्य लोग नहीं। धीरे-धीरे यह बिल्कुल स्वाभाविक बन जायेगा।          

(X, ३९८-३९९)

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कथा : विवेकानन्द केन्द्र { Katha : Vivekananda Kendra }
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मुक्तसंग्ङोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।
सिद्ध‌‌यसिद्धयोर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥१८.२६॥

Freed from attachment, non-egoistic, endowed with courage and enthusiasm and unperturbed by success or failure, the worker is known as a pure (Sattvika) one. Four outstanding and essential qualities of a worker. - Bhagwad Gita : XVIII-26