Saturday, 19 July 2014

स्वर्ग का ईश्वर अन्तरात्मा बन जाना चाहिए


            जहाँ सर्वप्रथम इस एकेश्वरवादसूचक भाव का आरम्भ होता है, वहीं वेदान्त का आरम्भ हो जाता है। वेदान्त इससे भी अधिक गम्भीर अन्वेषण करना चाहता है। वह कहता है कि इस माया-प्रपंच के पीछे जो एक आत्मा मौजूद है, जो माया का स्वामी है, पर जो माया के अधीन नहीं है, वह हमें अपनी ओर आकृष्ट कर रहा है और हम सब भी धीरे-धीरे उसी की ओर जा रहे हैं - यह धारणा है तो ठीक, पर अभी भी यह धारणा शायद स्पष्ट नहीं हुई है, अब भी यह दशर्न मानो अस्पष्ट और अस्फुस्ट है, यद्यपि वह स्पष्ट रूप से युक्तिविरोधी नहीं है।

 

            जिस प्रकार तुम्हारे यहाँ प्रार्थना में कहा जाता है 'मेरे ईश्वर, तेरे अति निकट' (Nearer my God to Thee), वेदान्ती भी ऐसी ही प्रार्थना करता है, केवल एक शब्द बदलकर 'मेरे ईश्वर, मेरे अति निकट' (Nearer my God to e) हमारा चरम लक्ष्य बहुत दूर है, प्रकृति से अतीत प्रदेश में है।

 

      वह हमें अपनी ओर खींच रहा है, उसे धीरे-धीरे हमें अपने निकट लाना होगा, पर आदर्श की पवित्रता और उच्चता को अक्षुण्ण रखते हुए। मानो यह आदर्श क्रमशः हमारे निकटतर होता जाता है - अन्त में स्वर्ग का ईश्वर मानो प्रकृतिस्थ ईश्वर बन जाता है, फिर प्रकृति में और ईश्वर में कोई भेद नहीं रह जाता, वही मानो इस देह-मन्दिर के रूप में बन जाता है और वही मानो अन्त में जीवात्मा और मनुष्य के रूप में परिज्ञात होता है।

 

      बस, यहीं वेदान्त की शिक्षा का अन्त है। जिसको ऋषिगण विभिन्न स्थानों में खोजा करते थे, वह हमारे अंदर ही है। वेदान्त कहता है - तुमने जो वाणी सुनी थी, वह ठीक सुनी थी, पर उसे सुनकर तुम ठीक मार्ग पर चले नहीं। जिस मुक्ति के महान आदर्श का तुमने अनुभव किया था, वह सत्य है, पर उसे बाहर की ओर खोजकर तुमने भूल की। इसी भाव अपने निकट और निकटतर लाते चलो, जब तक कि तुम यह जान लो कि यह मुक्ति, यह स्वाधीनता तुम्हारे अन्दर ही है, वह तुम्हारी आत्मा की अन्तरात्मा है। यह मुक्ति बराबर तुम्हारा स्वरूप ही थी, और माया ने तुम्हें कभी भी बद्ध नहीं किया। तुम पर अपना हक जताने का सामर्थ्य प्रकृति में कभी नहीं था।

(II, ८३)

 

यह एकत्व की भावना हमारा स्वभाव बन जाना चाहिए तभी हम मुक्ति का आनन्द उठा पायेंगे।


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कथा : विवेकानन्द केन्द्र { Katha : Vivekananda Kendra }
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मुक्तसंग्ङोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।
सिद्ध‌‌यसिद्धयोर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥१८.२६॥

Freed from attachment, non-egoistic, endowed with courage and enthusiasm and unperturbed by success or failure, the worker is known as a pure (Sattvika) one. Four outstanding and essential qualities of a worker. - Bhagwad Gita : XVIII-26