Saturday, 16 December 2017

निवेदिता के शैक्षिक दर्शन की प्रासंगिकता - 1

यतो धर्म: ततो जय:

इतिहास साक्षी है कि इस धरा पर, इस वसुन्धरा पर, प्रत्येक समय व काल में प्रतिभा सम्पन्न लोगों ने जन्म लिया है, कालान्तर में उन्होंने कृतित्व व व्यक्तित्व के द्वारा महत्वपूर्ण कार्य समाज व देश के लिए सम्पादित किये। निःस्वार्थ भाव से कार्य -निष्पादन के बाद महाप्रयाण कर गये। ऐसे ही सर्वगुण सम्पन्न व श्रेष्ठ व्यक्तित्व की धनी थी - आदर्श शिक्षाविद् निवेदिता। उन्होंने भारतीय शिक्षा के प्रचार-प्रसार व शैक्षिक दर्शन पर अपने विचार प्रस्तुत कर उन्हें क्रियान्वित करने का प्रयास किया। महिला शिक्षा, पाठ्यक्रम, पाठ्यचर्या, भाषा, भारतीय संस्कृति पर अवलम्बित शिक्षा, शिक्षा समाज व विद्यार्थी केन्द्रित, मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण शिक्षा व समग्र विकास का वाहक शिक्षा, इन सब बिन्दुओं पर उनके विचार भी प्रासंगिक है। सामाजिक कुरीतियों के निवारण व महिला सशक्तीकरण के लिए बाल-विवाह व अन्य बुराइयों पर अंकुश के लिए उन्होंने समय-समय पर विचार प्रकट किये। प्रस्तुत आलेख में भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर, उनके विचारों के सन्दर्भ में लिखने का प्रयास किया गया है। ऐतिहासिक परिप्रेक्षण किया जाये तो हमें ज्ञात होगा कि स्वाधीनता पूर्व 1882 में हण्टर आयोग, 1902 में विश्वविद्यालय आयोग, 1917 में सेडलर आयोग बनें। स्वाधीनता के बाद 1948-49 में राधाकृष्णन आयोग, 1952-1953 माध्यमिक शिक्षा आयोग, 1955-56 राजभाषा आयोग, 1964-66 कोठरी आयोग, 1986-राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1988 पाठ्यक्रम की रूपरेखा, 2000 में राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढाँचा, 2003-2005 राष्ट्रीय ज्ञान आयोग व 2016 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनी। उपरोक्त सभी योजनाएँ प्रत्येक विकासशील राष्ट्र की प्रगति के लिए आवश्यक है क्योंकि किसी राष्ट्र के समग्र विकास के लिए विभिन्न योजनाओं, नीतियों, परियोजनाओं पर दृष्टिपात की आवश्यकता के साथ-साथ इनके सतत् मूल्यांकन की भी आवश्यकता होती है। जब हम सम्पूर्ण व समग्र विकास की बात करते हैं तब ध्यान शिक्षा पर ही केन्द्रित हो जाता है। क्योंकि इसी सन्दर्भ में सिस्टर निवेदिता के शैक्षिक दर्शन ने सुसुप्त शैक्षिक बीज के प्राकट्य लिए प्रयास किये। 19वीं सदी के अंत तक भारत में शिक्षा के क्षेत्र में स्त्रियों की दशा अत्यन्त चिन्ताजनक थी। निवेदिता ने 16 बोसपाड़ा लेन, 1903 (कलकत्ता) में महिलाओं के लिए एक पाठशाला प्रारंभ की, श्री माँ के हाथों पूजा-अर्चना कराकर पाठशाला की औपचारिक शुरूआत की। राधाकृष्ण आयोग 1949-49 ने शिक्षा को सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक व आध्यात्मिक रूपान्तरण का उपकरण माना व कहा कि सभी को शिक्षा प्रदान करने का दायित्व सरकारों का है। उल्लेखनीय है कि ग्रामीण विश्वविद्यालय व ग्राम महाविद्यालय प्रारम्भ करने की उन्होंने बात कही। अप्रत्यक्ष रूप से निवेदिता ने जो महिला शिक्षा की प्रासंगिकता प्रतिपादित की, इसी को कार्यरूप देना था, जिसमें ग्रामीण विश्वविद्यालय खोलना प्रमुख कार्य था परन्तु आश्चर्य है कि इस नाम से देश मे कोई भी  विश्वविद्यालय नहीं है। उन्होंने ऐसी शिक्षा-पद्वति की उपयोगिता को रेखांकित किया जो भारतीय संस्कृति  को ध्यान मे रखकर बनाई जाये, भारतीय जीवन परम्पराएँ व संस्कारों से पोषित शिक्षा हो। कोठारी आयोग 1964-66 ने शिक्षा में सामाजिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों के साथ-साथ नैतिक मूल्यों का सामावेश हो, ऐसी शिक्षा पद्वति के बारे में कहा, इस प्रकार मूल्य आधारित व भारतीय संस्कृति को केन्द्र बिन्दु मानकर शिक्षा प्रणाली के निर्माण की अवधारणा, निवेदिता की सोच आज भी प्रासंगिक है। निवेदिता ने पाठशाला पाठ्यक्रम में बंगाली, अंग्रेजी, अंकगणित, भूगोल तथा इतिहास के समावेश पर जोर दिया। उल्लेखनीय है कि  राजभाषा आयोग 1955-56 ने शिक्षा के उद्देश्य यथा - पहुँच, गुणवत्ता व समानता को प्राप्त करने हेतु मातृ-भाषा व क्षेत्रिय भाषा के अध्ययन पर जोर दिया। इसी प्रकार राष्ट्रीय पाठ्यक्रम का ढाँचा 2000 मे रखा गया, जिससे प्राचीन ज्ञान-विज्ञान की जानकारी व इतिहास की विसंगतियों को दूर करने की अनुसंसा की। जैसे कि निवेदिता ने बंगाली (क्षेत्रीय भाषा ) इतिहास व अंकगणित पर ध्यान देने का सुझाव दिया। अतः इस आयोग ने भी इन्हीं विचारों को परिष्कृत रूप मे रखा। इतिहास में आज भी विसंगतियाँ विद्यमान है, जैसे आर्य बाहर से आये, भारत का इतिहास गुलामी का इतिहास है, जबकि आर्य यहीं के मूल निवासी व भारत का सतत् संघर्षषील इतिहास रहा।

- प्रो. मधुर मोहन रंगा
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हमें कर्म की प्रतिष्ठा बढ़ानी होंगी। कर्म देवो भव: यह आज हमारा जीवन-सूत्र बनना चाहिए। - भगिनी निवेदिता {पथ और पाथेय : पृ. क्र.१९ }
Sister Nivedita 150th Birth Anniversary : http://www.sisternivedita.org
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