Tuesday, 6 March 2018

निवेदिता - एक समर्पित जीवन - 24

यतो धर्म: ततो जय:

छात्राओं से वात्सल्य  (1)

उनकी छात्राओं में एक थी प्रफुल्ल मुखी, जो पाठशाला के पास ही रहती थी। वह बालविधवा थी। बहुत ही बुद्धिमती तथा उत्साही स्वभाव की इस लड़की को निवेदिता बहुत स्नेह करती। एकादशी व्रत के दिन वह हमेशा ही इस लड़की के लिए फल, मिठाई भेजा करती। एक बार की बात है निवेदिता दिन भर पाठशाला के कामकाज के पश्चात् डॉ. बोस के साथ व्यस्त रहीं। अचानक उन्हें यद् आया कि आज एकादशी का व्रत है और उसने प्रफुल्ल मुखी के खाने के लिए कुछ नहीं भिजवाया है। बस, अब निवेदिता का वहाँ एक पल भी रुकना असम्भव हो गया। वे तुरंत घर की ओर दौड़ी और पहुँचते ही प्रफुल्ल मुखी को बुलावा भेजा। उसे पास बिठाकर खेद प्रकट करते हुए निवेदिता बार-बार कहने लगीं - मेरी बच्ची, मैं तुम्हें फल, मिठाई भिजवाना कैसे भूल गयी ? मैंने तुम्हारे ऊपर कितना अन्याय किया है। मैंने खुद तो खाया; पर तुम्हें भेजना भूल गयी ? मुझसे कितनी बड़ी गलती हो गयी।