Friday, 29 January 2016

कार्यपद्धति

4. अपनी कार्यप्रणाली व्यक्ति के अंतकरण को विचार की मार्यादा में अवरुद्ध नहीं रखती। यह व्यक्ति को श्रेष्ठता, मान-सम्मान की लालसा पैदा करनेवाली आकर्षक वस्तुओं से मुँह मोड़ना सिखाती है। समाज से एकरस, एकरूप अवस्था का, साक्षात् अनुभव दिलाकर कार्यप्रवण करती है।

5. मनुष्य कार्यपद्धति का मूल्यांकन इस कसौटी पर करता है कि वह तुरंत फलदायी है या नहीं। वह सोचता है कि वर्तमान समस्याएँ हल करने में ही कृतार्थता है। अतः कार्य की रचना ऐसी हो जिससे व्यावहारिक समस्याएँ हल करने में सफलता मिल सके। परंतु प्रश्न यह है कि क्या इन तात्कालिक समस्याअों पर ही राष्ट्र का सारा जीवन निर्भर है? भीषण गरीबी, आर्थिक विषमता आदि जो अनेक समस्याएँ सामने खड़ी हैं, उन्हें हल करने के लिये राजनैतिक शक्ति के प्रयोग और उपभोग की प्रवृत्ति पैदा होती है। ये वर्तमान समस्याएँ हल हुईं भी तो क्या राष्ट्र के सामने और समस्याएँ नहीं रहेंगी? समस्याएँ बदलेंगी, रोज नई उपाय योजना करनी पडे़गी। परंतु प्रयत्न करने की परंपरा न हो तो वह किस प्रकार संभव होगा? प्रयत्न करने की अविच्छिन्न परंपरा निर्माण करने के प्रयासों में ही अंतिम कल्याण है।

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The main theme of my life is to take the message of Sanatana Dharma to every home and pave the way for launching, in a big way, the man-making programme preached and envisaged by great seers like Swami Vivekananda. - Mananeeya Eknathji

विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी (Vivekananda Kendra Kanyakumari)
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. . . Are you Strong? Do you feel Strength? — for I know it is Truth alone that gives Strength. Strength is the medicine for the world's disease . . .
This is the great fact: "Strength is LIFE; Weakness is Death."
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