Wednesday, 17 January 2024

पहाड़ी रामायण में अद्भुत प्रसंग

आदौ राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं कांचनम्।  वैदीहीहरणं जटायुमरणं, सुग्रीवसंभाषणम्।।
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं, लंकापुरीदाहनम्।  पश्चाद् रावण कुम्भकर्ण हननम्, एतद्धि रामायणम्।।

हिमाचल प्रदेश के विभिन्न भागों में प्रचलित पहाड़ी हि लोक रामायण में ऐसे अद्भुत प्रसंग हैं जो मूल रामायण या रामचरित मानस में नहीं मिलते। यही इस लोक रामायण की महत्ता है। लोक कवियों ने अपने ढंग से राम कथा का बखान किया । वे रामचरित मानस घटनाक्रम, पात्रों, संवादों से अलग एक रामायण की रचना करते हैं जो लोग के अनुकूल तथा लोक के करीब है। कुल्लू, महासू, किन्नौर, चम्बा, सिरमौर, कांगड़ा आदि  क्षेत्रों में यह लोक रामायण अपने ढंग से बखानी जाती है।

यूं तो हिमाचल ही नहीं, पूरे भारतीय मानस में राम शब्द प्रत्येक मनुष्य की रग-रग में समाया है। लोक संस्कृति में तो राम के बिना कुछ सम्भव ही नहीं। दुःख में कुछ में राम का साथ, साये की तरह बना रहता है। यदि दीपकण कण में भगवान का वास मानते हैं तो मनुष्य के नेत्ररोम में राम है। हिमाचल में भी कांगड़ा से किन्नौर, शिमला से सिरमौर, कुल्लू से भरभौर तक राम का वही महत्व है जो यहां की हवा का है, यहां के पानी का है।
 
"सिया राम मय सब जग जानी" की उक्ति इस प्रदेश में बिल्कुल सटीक बैठती है। बेशक यहां हजारों की इंख्या में देवी देवता हों, लोक या ग्राम देवताओं में कितनी ही आस्था हो, राम सब में समाए हैं। अंततः लीग राम का स्मरण करते हैं। "हे राम !" शब्द एक ऐसा शब्द है जिसका उच्चारण मनुष्य चलते उठते बैठते करता है। जो नहीं भी करता है, उस के मुंह से भी गाहे बगाहे हे राम निकल जाता है। है। खूशी में, गमी में, हास में, परिहास में राम नाम का उच्चारण वैसे ही होता है, जैसे आदमी के मुंह से 'माँ' शब्द उच्चारण स्वाभाविक और सहज रूप से होता है।

"राम" शब्द की महिमा का गान करते हुए हम संत तुलसीदास को नहीं भुला सकते। यह तुलसीदास का ही प्रताप है कि आज सब लोग राम राम का जाप करते हैं। तुलसीदास ने अपनी शब्द शक्ति के बल से पूरे भारत में राम नाम का प्रचार किया। "रामायण" जैसी कृति दे कर उन्होंने राम नाम की महिमा रामायण' जैसी कृति दे कर भारत में इसका ऐसा प्रचार किया कि यह शब्द जन-जन का मंत्र बन गया। वाल्मीकि राम जैसे सशक्त बातमी कि पहले ऐसी विभूति थे जिन्होंने तुलसीदास ही ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने रामको जन जन तक पहुंचाया। इनमें तुलसीदास ने राम को लोक का नायक बना दिया और सभी जन राम मंत्र का जाप करने लगे। हमारे प्रदेश में भी राम कथा का गायन घर-घर होने और सर्दियों में लंबी रातों में रामकथा का गायन सुनने आसपास के लोग किसी एक घर में इकट्ठा हो जाते। राम नाम की महिमा ने कई लोगों को सहारा दिया और राम शब्द कइयों का सम्बल बना। रामचरित मानस का पवित्र ग्रंथ घर में रखना एक धार्मिक और पवित्र कृत्य माना जाने लगा।

लोक में राम एक आदर्श पुरुष हैं। उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। एक आदर्श राजा और प्रजापालक होने के साथ-साथ, वे एक आदर्श पुत्र, पति, भाई हैं। रावण जैसे राक्षसों का नाश करने और साधारण जन के सम्बल राम एक आदर्श मित्र और दुर्बलों के बल हैं।

राम नाम की महिमा भी अपरम्पार है। हर बोल में राम बोलने की एक प्रथा है। कभी एक दूसरे से मिलने पर भी "राम राम" या "जै रामजी की" बोला जाता है। "हे राम" जैसे शब्द तो अनायास ही मुंह से निकल जाते हैं। दुख में, तकलीफ में, आश्चर्य में 'राम', 'हाय राम' नाम ही उच्चरित होता है।

ऊना के एक गीत में सब कुछ राममय होने का सुन्दर वर्णन है। गीत में सीता कहती है -
 तुम बी राम, चलते राम फिरते राम।  
 अंदर राम बाहर राम, चक्की राम चूल्हा राम।
 राम सुआरे सब के काज, जप लै श्रीरामराम।।"
 
  कांगड़ा के एक गीत में उल्लेख है: ,राम राम इदये बसाये जोवन जन्म सुधारेया।"
यह बात कम आश्चर्य की नहीं है कि सदियों से हमारे यह भी रामलीला का मंचन हो रहा है। रामलीला हमारे लोक में रामलीला, वही प्रसंग, वही संवाद। इसके बावजूद हर वर्ष उसी तरह का मंचन बार बार। यह राम कथा के महत्व और लोगों में इसके प्रति अगाध विश्वास लोक नाटक, नौटंकी या अच्छे से अच्छा को नाटक या फिल्म कोई व्यक्ति दूसरी बार नहीं देखना चाहता। बार बार देखने का तो कोई औचित्य ही नहीं। अच्छी से अच्छी फिल्म भी कोई दो बार से अधिक नहीं देखता। किंतु यह बहुत ही हैरानी का विषय है कि वही राम कथा, वही पात्र, वही दृश्य, वही संवाद लोग बार- बार देखते हैं। आज भी लोग राम लीला उसी चाव से देखते हैं चाहे वह व्यवसायिक कलाकारों द्वारा की जा रही हो, चाहे गांव के लड़कों द्वारा। यह सदियों से हो रहा है जो राम तथा राम कथा के प्रति हमारी आस्था को दर्शाता है। नवरात्रों में देश और प्रदेश के कई भागों या यूं कहें कि गांव गांव में राम लीला का मंचन होता है और हर वर्ष उसी चाव से लोग देखते हैं। गांव तो गांव शहरों में भी उतनी ही संख्या में लोग आते हैं बेशक टेलिविजन जैसे दैत्य ने सब को बांध रखा है। राम लीला में बच्चे, जवान और बूढ़े सभी उत्सुक दर्शक बन जाते हैं, हालांकि उसमें नया कुछ नहीं होता। अमीर, गरीब, शिक्षित, अशिक्षित सब एक समान और एक जगह बैठ कर रामलीला का आनन्द लेते हैं। यही इस कथा की महानता है और महत्व है।

हिमाचल प्रदेश में रामायण या रामकथा की करें विशेषताएं रही हैं। इन में प्रमुख यह हैं कि यहां राम का मानवीकरण किया गया है। राम या किसी भी अन्य शक्ति को एक साधारण मानव या यूं कहें अपनी तरह देखने का एक प्रबल भाव यहां के लोक मानस में रहा है। शिव को गद्दी लोग अपनी तरह मूंछ वाला बनाते हैं।  गौरा उसे नालों में ढूंढती है:

"रिढ़ियां तां रिढ़ियां धूडू नचंदा, नाले तो खोले गौरां तोपंदी"

इसी तरह उनके राम और लक्ष्मण चौसर खेलते। तो सिया कसीदा काढ़ती है: "राम ते लछमन चौसर खेलंदेः सिया राणी कढंदी कसीदा हो"

यहां राम न तो भगवान हैं और न ही राजपुत्र, साधारण मानव हैं और उसी तरह रहते हैं जैसे स्वयं गद्दी लोग रहते हैं। वही पहनते हैं, वही खाते पीते हैं। राम को ऐसा अपनी तरह मानव समझने का भाव पूरे प्रदेश में पाया जाता है।

दूसरी प्रमुख विशेषता यह है कि महाभारत हो चाहे रामायण, लोक में उसका गायन, घटनाओं का वर्णन अपने ढंग से किया गया है। यह आवश्यक नहीं है कि में रामायण में घटनाक्रम का वर्णन है उसका ज्यों का ज्ये वर्णन लोक में भी किया जाए। कथा में अपने पात्र भी हैं। इसी तरह राम कथाओं में अंतर भी पाया जाता है। किन्नोर में प्रचलित एक लोक गीत में भरत को बड़ा भाई बताया गया है और भरत को राजा बनने के योग्य न होने पर उसे राजा नहीं बनाया गया। कैकेयी का चरित्र भी बुरा नहीं बताया गया। कैकेयी पर दबाव डालने वाली औरत का नाम फाफा कुटोन है। किन्नौर में राम कथा का श्रवण श्रद्धा से धूप दीप आदि जला कर करने के निर्देश दिए गए हैं। कुल्लू में कैकेयी राक्षसों की धियाण अर्थात वंशज या बेटी हैं। कांगड़ा, चम्बा में राम कथा को "रमैणी" कहा जाता है। इस लोक गीत में बचपन में राम गांव में मुंडुओं अर्थात लड़कों के साथ खिन्नू अर्थात गेंद खेलने लगते हैं। वे गेंद को इतनी जोर से मारते हैं कि गेंद कुएं में जा गिरती है। गेंद का स्वामी राम पर बहुत गुस्सा करता है। राम ने बमत्कार दिखाया। कुएं से एक बिल्ब का पेड़ उगा जिसकी हर शाख में गेंद लटके थे। सभी बच्चों ने एक- एक गेंद लिया और मजे से खेलने लगे।

निरमण्ड की ओर राम कथा में यह उल्लेख आता है कि कैकेयी ने जब भरत को राज्य और राम को वनवास मांगा तो एक शर्त रखी कि वे सोने की एक गेंद आकाश की ओर फेंकेंगी। जितनी देर में गेंद वापिस आएगी, दशरथ उतने समय में अपना निर्णय कागज पर लिख दें, वह उसे मान जाएगी। कैकेयी ने गेंद उछाली और उसकी बहन कोकई ने पकड़ ली और नीचे ही नहीं आने दी। राजा दशरथ ने कागज पर राम को वनवास और भरत को राजपाट लिख दिया और मुख्य द्वार पर टांग दिया। राम लक्ष्मण ने द्वार पर यह लिखा हुआ पढ़ा और निर्णय लिया कि अब इस नगरी में अन्न खाना हमारे लिए घोर पाप है। इसी तरह का प्रसंग कांगड़ा में भी मिलता है। गीत में वर्णन है कि राजा दशरथ राम को बनवास की बात बता नहीं पाए और उन्होंने यह आदेश एक कागज पर लिखा और प्रवेश द्वार पर चिपका दिया। राम खेलने के बाद घर आए तो यह आदेश द्वार पर लिखा हुआ पढ़ा। इसे पढ़ते ही वे खुशी से वन में जाने को तैयार हो गए।

लाहौल में "घुरे" गीत में राम लक्ष्मण को जो "सोदुरू" अर्थात सगे भाई माना गया है: "ए रामा ए चों लकूमाणा दुये सौदुरे भाये। ए राणी ए सीता बरूं ए हैं मंगाये।।" सीता हरण प्रसंग में राम मायावी हिरण को  मारने में सफल हो जाते हैं। कौवा उन्हें हिरण की खाल खींचने की विधि बताता है। राम उस विधि से हिरण की खाल निकाल लेते हैं और सोने के सींग भी निकाल लेते हैं ताकि सीता को दे सकें। हिरण को मारने और खाल निकालने का यहां एक लम्बा प्रसंग है जिसमें रावण का साधु वेश में डमरू बजा कर भिक्षा मांगने और अपनी जटा में बग का फूल लगवाने की कथा है। कांगड़ा में भी राम को खाल उतारने में कठिनाई आती है। राम समझ से काम ले कर जहां खाल उत्तारते हैं, वहां कील लगाते जाते हैं। सिरमौर में प्रचलित गीत के अनुसार जब राम कुटियाँ में वापस आते हैं तो सीता को बहां न पाकर राम लक्ष्मण पर संदेह करते हैं। लक्ष्मण शाम को खाना पकाने के लिए आग जलाने लगते हैं तो चूल्हे में केवल एक लड़की लगा कर ही फूंक मार जलाने का प्रयास करते हैं। राम इस प्रयास को व्यर्थ बताते हैं तो लक्ष्मण कहते हैं कि जिस तरह एक लकड़ी से आग नहीं जल सकती, उसी तरह एक अकेला भाई भी कुछ नहीं कर सकता।

इस तरह अनेकों प्रसंग हैं जो राम कथा में अपने ढंग से बखाने गए हैं और उन में लोक में व्याप्त देश काल को ध्यान में रखा गया है। राम तथा अन्य पात्र अयोध्या के नहीं, बल्कि उसी क्षेत्र के लगते हैं जहां कथा का गायन किया जा रहा है। उसकी वेश-भूषा, हाव-भाव, रहन- सहन, बोल-चाल तथा क्रियाकलाप सब उसी क्षेत्र के होते हैं।

राम या राम कथा की एक अन्य विशेषता यह है कि लोक गीत या कथा किसी भी देवता की हो, उसमें अंत में "राम" अवश्य आता है। सभी संस्कार गीतों में बार-बार राम का उच्चारण किया जाता है और नहीं तो गीत के बोल का अंत राम से किया जाता है यथा एक विवाह गीतः
"चार चकुंटे फिरी आया, वर नजरी नी आयो राम
चार चकूटे च साधु तपस्वी, बैठी धूणियां लगाइयां राम।"

यदि कृष्ण गीत गाया जा रहा है तो उसका अंत भी "राम" से किया जाता है:

"संझां जे होईयां संझैला जे होईयां, कृष्ण घरे नहीं आया राम।"
या एक पंक्ति के साथ "श्याम" लगाया जाता है तो दूसरी के साथ "राम"।

प्रदेश में राम कथा के कई रूपांतर प्रचलित हैं। 'हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता उक्ति यहां साकार रूप में देखने को मिलती है। जहां बालक के जन्म से संबंधित अधिकांश को मिलती है जुड़े हैं, वहीं किन्हीं गीतों में राम का भी गीत कृष्ण से जुड़े बिलासपुर का एक लोकगीत देखिए: "चैत्र वानणियां रातीं, अवधपुरी जन्मेया राम जी बैर काहीसे पीहड़ा पलंपूड़ा, काहे री तेरी बणी ओ कटोरी काहे की गुड़ सत्त घोली, मेरे राम जी... चैत्र महीने...।"

कई लोकगीत, कई लोक गाथाएं यहां प्रचलित हैं जो रामकथा को प्रदर्शित करती हैं। रामचरित मानस के अतिरिक्त इन कथाओं में राम कथा अपने अपने ढंग से बखानी गई है। प्रदेश में यूं तो शिव-शक्ति का प्राधान्य बखानी है। आदि देव शिव कैलासवासी हैं। एक ओर तो भरमौर में कैलास हे तो दूसरी और किन्नौर में। उधर कांगड़ा, बिलासपुर, उना में प्रसिद्ध शक्तिपीठ हैं। इस सब बावजूद रामपूजा का भी कम महत्व नहीं है। राम के को लक्ष्मीनारायण के रूप में भी पूजा जाता है। चम्बा का लक्ष्मीनारायण मंदिर प्रसिद्ध है।

राम पूजा के मण्डी तथा कुल्लू, दो जीवन्त उदाहरण हैं। कुल्लू में राजा जगत सिंहः १६३७-१६६२: के समय देव शिरोमणि रघुनाथ जी का आगमन हुआ। इससे पूर्व शैव सम्प्रदाय के नाथ ही राजाओं के गुरु थे। राजा जगत के समय रघुनाथ जी की मूर्ति अयोध्या से लाई। राजा छड़ीबरदार बना और राज्य रघुनाथ जी को सौंपा।

प्रसिद्ध कुल्लू में दशहरे के साथ साथ जलविहार, वनविहार, बसंत पंचमी व होली के त्यौहार मनाए जाने लगे। होली यद्यपि श्रीकृष्ण से संबंधित है। कुल्लू में होली को भी रघुनाथ के गीत गाए जाते हैं। यहाँ "रघुनंदन के संग होरी" मनाई जाती है। इसी तरह लगभग एक ही समय में राजा सूरज सेन के समय (१६३७) मंडी में भी "माधोराव" की मान्यता हुई। इससे पूर्व राजा शैव थे और शिवरात्रि का उत्सव मनाया जाता था। कहा जाता है राजा सूरज सेन के अठारह पुत्र हुए जिनमें कोई जीवित नहीं बचा। राजा है। उत्तराधिकारी के रूप में माधोराव की प्रतिमा बनाई और कुल्लू की भांति राज्य इसे सौंप दिया। राज्य के देवता कुल्लू की भांति शिवरात्रि उत्सव में पहले माधोराव के पास हाजिरी देने लगे। यह प्रतिमा स्वर्णकार भीमा द्वारा इस पर खुदे लेख के अनुसार वि. १७६५ की मानी जाती है। इस तरह इन दोनों राज्यों में रघुनाथ से संबंधित पर्व मनाए जाते रहे।

"उधर चम्बा के राजा भी शैव थे। भरमौर का शिव मंदिर और चौरासी सिद्धों की कथा इसका प्रमाण है। राजा साहिल वर्मन द्वारा (९२०-२४०) राजधानी भरमौर या ब्रह्मपुर में बदल कर चम्बा में स्थापित की गई। गजेटियर में उल्लेख है कि राजा ने अपने पुत्रों को विष्णु प्रतिमा बनाने के लिए विंध्याचल भेजा। इन्हें लुटेरों ने मार दिया। अंत में युगाकरवर्मन सन्यासियों की सहायता से लुटेरों को मार संगमरमर लाने में सफल हुआ और राजा साहिल वर्मन ने विष्णु प्रतिमा बनवा कर लक्ष्मीनारायण मंदिर बनवाया। यहां मिंजर महोत्सव मनाया जाने लगा जिसमें रघुनाथजी की प्रतिमा पालकी में रख कर शोभा यात्रा निकाली जाती है। इस प्रकार हिमाचल प्रदेश में ऐतिहासिक और लोक दोनों ही प्रकार से राम तथा राम कथा का महत्व है। लोक मानस में राम उसी तरह समाए हैं जैसे उनके जीवन और जीवन पद्धति का अभिन्न अंग हों।

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- सुदर्शन वशिष्ठ
(संदर्भ - साहित्य परिक्रमा - जनवरी २०१२ - भाव रुप राम )

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Tuesday, 16 January 2024

ओड़िआ साहित्य में रामकथा

आदौ राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं कांचनम्।  वैदीहीहरणं जटायुमरणं, सुग्रीवसंभाषणम्।।
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं, लंकापुरीदाहनम्।  पश्चाद् रावण कुम्भकर्ण हननम्, एतद्धि रामायणम्।।

सदियों से भारतीय जनजीवन में भक्ति का अखंड प्रवाह देखने को मिलता है। भारतवर्ष में कभी साधु-संतों ने निर्गुण निराकारवादी परंब्रह्म की उपासना की है तो कभी यहाँ के भक्तों, उपासकों, कवियों ने सगुण साकार वाले श्रीराम और कृष्ण जैसे अवतारी पुरुषों की अद्भुत महिमा का संकीर्तन किया है। खासकर भारतीय साहित्य में राम और कृष्ण को लेकर प्राचीन काल से अब तक असंख्य रचनाएँ रची गई हैं।

ओड़िसा में भक्ति आन्दोलन और ओड़िआ साहित्य में रामकथा की एक प्राचीन परंपरा है। धर्मनिष्ठ उत्कलियों के साथ रामकथा का संबंध अत्यन्त घनिष्ठ और अभिन्न दिखाई देता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के ओड़िआ प्रतिनिधि कवियों में सारलादास का महत्वपूर्ण स्थान है। आपने सबसे पहले ओड़िआ साहित्य में महाभारत के साथ-साथ रामकथा को स्थान दिया था। आपकी विशिष्ट कृति 'सारला महाभारत' की एक अलग पहचान है। यद्यपि है। आपने संस्कृत के 'अ‌द्भुत रामायण' के आधार पर 'विलंका रामायण' लिखी है फिर भी इसमें आपकी मौलिक प्रतिभा का परिचय मिलता है। सारलादास शक्ति के उपासक थे। इसलिए उन्होंने 'विलंका रामायण' में माता सीता को अद्भुत शक्ति और वीरता का वर्णन किया है। लंकापुरी के दक्षिण में सौ योजन की दूरी पर विलंका नगरी के राजा हैं सहस्त्र स्कन्ध रावण। उसके अन्याय और अत्याचार से सारा संसार भयभीत रहता है। तब स्वर्ग में देवताओं के बीच इस पर काफी चर्चा होती है। यमराज भी संत्रस्त होकर इस दुष्ट के निधन के लिए ब्रह्म से अनुरोध करते हैं। ब्रह्मा के मुख से 'विलंका अधिपति रावण का वध केवल श्रीराम से संभव है' ऐसी बात सुनकर देवता लोग राम के पास जाकर गुहार करते हैं। तब श्रीराम लोक कल्याणार्थ रावण के साथ युद्ध करते हैं। युद्ध स्थल में राम, लक्ष्मण और हनुमान आदि को बार-बार पराजय स्वीकार करना पड़ती है। अंत में सीता मंगलादेवी से के वेश में धनुष और पंचवाण लेकर मोहिनी कन्या स्थल में पहुँचती है। कवि के शब्दों में-

"नव जउवनदेवी देलेक देखाइ
पंचुशर वाण गुण रे बसाइ
धनुमंत्र पढ़ि जनक कुमारी
असुर उपरकु विंधिले शर धरि।"

माता सीता  के इशारे से प्रभु श्रीराम कामातुर रावण पर वाण चलाकर उसके समस्त सिर काट देते हैं। विलंका रावण की मृत्यु के बाद संसार में शान्ति स्थापित होती है। वस्तुतः सारलादास की 'विलंका रामायण' में इस कुछ ऐसी कथाएँ वर्णित हैं जो रामकथा की परंपरा अलग महत्व रखती हैं।  लक्ष्मण के द्वारा सूर्पणखा के पुत्र का वध, हनुमान का रुद्रावतार, ब्रह्मा के शौर्य से वाल्मीकि उत्पत्ति जैसी कथाओं को इस संदर्भ में लिया जा सकता है।

ओड़िआ साहित्य में रामकथा को आगे बढ़ाने है कवि बलराम दास की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्हें उत्कल के वाल्मीकि कहा जाता है। सोलहवीं शताब्दी में ओड़िसा में पाँच महापुरूषों का आविर्भाव हुआ था। ये हैं बलराम दास, जगन्नाथ दास, अनन्त दास, यशोवन्त दास और अय्युतानंद दास। इन्हें पंचसखा कहा जाता है। बलराम दास ने हिंदी के 'रामचरित मानस' और तमिल की' 'कंबु रामायण' की भाँति ओड़िआ भाषा में 'जगमोहन रामायण' लिखा था। उन्होंने महाप्रभु श्री जगन्नाथ जी के आदेश पर इस ग्रंथ की रचना की थी। उनकी निम्नलिखित उक्ति से यह स्पष्ट होता है।

"श्री जगमोहन एहि रामायण ग्रंथ
एथिरे कवि ये नीलगिरि जगन्नाथ।"

बलराम दास और गोस्वामी तुलसीदास दोनों समकालीन हैं। तुलसीदास ने व्यावहारिक और आध्यात्मिक दृष्टि से जहाँ रामकथा को रामचरित मानस कहा है वहीं बलराम दास ने अपने आराध्य प्रभु श्री जगन्नाथ जो के नाम से इसे जगमोहन रामायण कहा है। ओड़िआ के कुछ समीक्षकों ने इसे 'दांडी रामायण' कहा है। 'जगमोहन रामायण' की विषय वस्तु मूल रामायण से मौलिक प्रतिभा का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। इस रामायण में ओड़िसा के लोगो की ह्वदय की बात की है।

ईसमें वर्णित राम और सीता सुदूर अयोध्यापुरी के निवासी नहि बल्कि ओड़िसा के बताये है। इसकी पूरी कथावस्तु शिव-पार्वती के संवाद के रस में प्रस्तुत की गई हैं। ओड़िसा में अभी तक यह ग्रंथ अपने ढंग का बेजोड़ रामायण है। इसमें वर्णित ऋश्थश्रृंग जन्म चरित, अगस्त्य भारत, शिवधनु तोड़ने के लिए वाणासुर, रावण तथा इन्द्र आदि की विफल चेष्टा जैसे कई प्रसंग वाल्मीकि रामायण ते स्वतन्त्र जान पड़ते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं कवि बलराम राम ने रामायण की कुछ घटनाओं को ओड़िसा प्रांत में समाहित होने का वर्णन किया है। श्रीराम के वानर सेनापतियों का जन्मस्थान ओड़िसा के कोणार्क, धवलगिरि, विरजा क्षेत्र याजपुर को माना गया है। राजा दशरथ की चौथी रानी ओड़िसा के याजपुर नगर की थी। उसका नाम लीलावती था। वह शत्रुघ्न को अपना पुत्र मानती थी तथा स्तनपान कराती थी। बलराम दास ने ओड़िसा के दंडकारण्य, महेन्द्र गिरि, रामगिरि आदि को राम से संबंधित माना है। श्रीराम के वनवास के समय जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को क्रमशः राम, लक्ष्मण और सुभद्रा माना है और उन्हें श्रीक्षेत्र (पुरी) में घुमाया है। इस प्रकार उत्कल वाल्मीकि बलराम दास ने रामायण की विषय वस्तु के साथ उत्कलीय हिंदू समाज की जीवनशैली, वेशभूषा, चाल चलन आदि का विस्तृत वर्णन किया है। भाव, भाषा और शैली की दृष्टि से राम साहित्य में जगमोहन रामायण का एक अलग वैशिष्ट्य है।

सोलहवीं शताब्दी में नीलाम्बर दास द्वारा लिखी गई 'टिका रामायण' में विषय वस्तु की दष्टि से कुछ भिन्नता पाई जाती है इसमें रावण की कथा, लव-कुश युद्ध जैसे नवीन प्रसंगो की अवतारणा की गई है। ओड़िसा साहित्य में पंचसखा युग के बाद काव्य युग के कवियों में कवि अर्जन दास द्वारा लिखे गये 'राम विभा' काव्य को पहला गेय काव्य माना जाता है। इसमें रामभक्ति का चरम निदर्शन है। इस काव्य में राम के विश्वामित्र ऋषि के साथ यज्ञ रक्षा के लिए वन गमन, वहीं से जनकपुरी जाकर जानकी से विवाह करना और अंत में अयोध्या प्रत्यावर्तन तक की सारी घटना केवल बारह छन्दों में वर्णित है। रामकाव्य की परंपरा में सत्रहवीं सदी में घुमसर के राजा भंज द्वारा लिखा गाया महाकाव्य - रघुनाथ विलास एक स्वतन्त्र स्थान का अधिकारी अधिकारी है। ईसमें प्रभु श्रीरामचंद्र की अभूतपूर्व महिमा का वर्णन है।

आगे चलकर सत्रहवीं सदी के मध्य भाग के ओड़िआ कवियों में कवि सम्राट उपेन्द्र भंज ने 'वैदेहीश विलास', 'रामलीलामृत', 'अवना रस तरंग' जैसे ग्रंथों की रचना कर राम साहित्य के विकास में चरम उत्कर्षता ला दी। वस्तुतः ओड़िआ राम साहित्य में 'वैदेहीश विलास' काव्य एक अभिनव सृष्टि है। इस काव्य की हर पंक्ति का प्रारंभ 'ब' अक्षर से शुरु होता है। उदाहरण के तौर पर-

"बधिर नुहड़ वीर बोइला तहुँ धीबर
शुणिलिणि पथरे पथर अबका,
बालि पड़ि तो चरण स आशंका उपुजे एणु
नउका नायिका हेले बुड़िव भेका
वृत्ति ए मो पोषे कुटुंब ।।
बसाइ न देवि नावे न धोड़ पाद।।"

श्रीराम जी को वन गमन करते समय रास्ते में गंगा नदी पार करना पड़ता है। नदी में केवट नाव पर बैठा था। श्रीराम जब केवट से गंगा नदी पार करने को कहते हैं तब केवट कहता है- "हे वीर! मैं बहरा नहीं हूँ। रास्ते में आते समय तुम्हारे चरणों में लगी हुई बालू के स्पर्श से पत्थर अबला बन जाने की बात मैंने सुनी है। इसलिए मेरे मन में शंका है। यदि मेरी नाव तुम्हारे चरणों के स्पर्श से नारी का रूप धारण करेगी तो मेरी कैसी दशा होगी। मेरा सहारा डूब जाएगा। यह मेरी वृत्ति है 'इसी से मैं परिवार पोषण' करता हूँ। इसलिए मैं तुम्हारे चरणों को धोये बिना नाव पर बैठने नहीं दूँगा।" अनुरूप पद 'रामचरित मानस' में देखने को मिलता है।
"माँगी नाव न केवट आना। कहै तुम्हार मरम मैं जाना।
चरन कमल रज कहँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई ।।
छुवत सिला भड़ नारि सुहाई। पाहन में न काठ कठिनाई।।
तरनिउँ मुनिधरनी होड़ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई ।।
एहि प्रतिपाली सब परिवारू। नहि जानी कए और कथारू ।।
जी प्रभु पार अवसि गा चहरू। मोहि पदपदुम पखारन कहहू।।"

'वैदेहोश विलास' और 'रामचरित मानस' से दिये गये उपर्युक्त दो पदों में भाव साम्य होते हुए ही 'वैदेहोश विलास' के इस पद में भाषा और शैली की दृष्टि से अभिनवता है। वस्तुतः रामकाव्य की परंपरा में विलास को केवल ओडिआ साहित्य में नहीं बल्कि भारतीय साहित्य में एक अलग पहचान है। इसमें प्रभु श्रीरामचंद्र जी की अभूतपूर्व महिमा को सरल और सुबोध्य भाषा में वर्णन किया गया है। इसी युग में प्रख्यात रामोपासक कवि विश्वनाथ खुटिआ से लिखे गये छंदोबद्ध काव्य 'विचित्र रामायण' को बड़ा आदर मिला है। विषयवस्तु की उपस्थापना शैली, भाषा आदि की दृष्टि से इसका महत्व है।

आधुनिक ओड़िआ साहित्य में कई कवियों ने रामकथा को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। कविवर राधानाथ राय, व्यासकवि फकीर मोहन, भक्त कवि मधुसूदन राव जैसे प्रख्यात कवियों ने रामकथा से संबंधित मौलिक और अनुदित रचनाओं से ओड़िआ साहित्य को समृद्ध किया है। नंद किशोर बल का 'सौता वनवास' और गंगाधर मेहेर का 'तपस्विनी' काव्य रामकथा के आधार पर लिखे गये उच्चकोटि के काव्य माने जाते हैं। 'तपस्विनी' काव्य की मूल वस्तु को कवि ने यद्यपि 'रामायण', 'रघुवंश' और 'उत्तर रामचरित' से लिया है, फिर भी इसमें कवि की मौलिकता भरपूर है। इस काव्य को उपजीव्य विषयवस्तु निर्वासित सीता के त्यागपूत जीवन की करुण कहानी है। इस काव्य में सीता ही तपस्विनी हैं। तपस्विनी सीता के चरित्र पर काव्य का नामकरण हुआ है। पूरे काव्य में आदर्श पति, आदर्श पत्नी, आदर्श गृहिणी, आदर्श नारी, आदर्श माता, आदर्श भ्राता आदि का चरित्र चित्रित है। खासकर आलोच्य काव्य में वर्णित सीता का चरित्र अत्यंत हृदयस्पर्शी है। भारतीय नारी शांति, प्रीति, ममता और सतीत्व की मूर्तिमयी प्रतीक है। कवि गंगाधर ने सीता के चरित्र में इन सारे गुणों को दिखाया है। पति देव राम के द्वारा निर्वासिता होने पर भी सीता के मन में विरोध-भाव उत्पन्न नहीं होता। बल्कि अंत तक उनके मन में आराध्य पतिदेव श्रीराम जी के प्रति अटूट भक्ति बनी है। निर्वासिता सीता कहती है- "मो कर्म पाइँ दोषी नुहंति विधि कांत त स्वभावे मो करुणा निधि ।।"

कवि गंगाधर ने श्री रामचंद्र के त्यागपूत आदर्श जीवन का बखूबी चित्रण किया है। एक पत्नी व्रत भारतीय संपूर्ण संस्कृति का आदर्श है, कवि ने श्रीराम के जीवन में इमे दिखाया है। वे दयालु हैं। वीरता के प्रतीक हैं। कवि शब्दों में- "शरण-वत्सल-ध्वज-रिपु राजांकुश, दुःख-गिरि-बज्र जहिं देखन्ति विदुष।"

रामचंद्र प्रजानुरंजन के लिए सीता का निर्वासन करते हैं, परन्तु सीता के प्रति उनके मन में अटूट ममता है। यह निर्वासन उनके लिए असह्य हो जाता है। वे दुःख में व्याकुल हो उठते हैं। कवि ने इसे बड़ी मार्मिकता से स्पष्ट किया है- "नयन युगल काहिंकि विकल होइ छाडुअछि जल,
शुखिगले सर कमलिनी मोर
होइजिब टलमल।"

सांप्रतिक काल के ओड़िआ साहित्य की विविध विधाओं में रामायण की विविध घटनाओं की उपस्थापना की जा रही है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के उदात्त चरित्र का चित्रण किया जा रहा है। सीताकांत महापात्र जैसे प्रख्यात ओड़िआ कवि ने भी रामायण के कुछ चरित्रों को लेकर आधुनिक ओड़िआ कविता में प्रतीक के रूप में स्थान दिया है। इस प्रकार देखा जाय तो ओड़िआ साहित्य में प्राचीनकाल से लेकर आज तक रामकथा की एक अटूट परंपरा है।

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- डॉ. विजय कुमार महांति
(संदर्भ - साहित्य परिक्रमा - जनवरी २०१२ - भाव रुप राम )

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तेलुगु लोकसाहित्य में रामकथा

आदौ राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं कांचनम्।  वैदीहीहरणं जटायुमरणं, सुग्रीवसंभाषणम्।।
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं, लंकापुरीदाहनम्।  पश्चाद् रावण कुम्भकर्ण हननम्, एतद्धि रामायणम्।।

भगीरथ तपस्या के फलस्वरूप धरती पर अवतीर्ण मंदाकिनी भूतल के पर्वतों, जंगलों, मैदानों, गांवों, शहरों का स्पर्श करती हुई आखिर सागर में मिलती है। इसी प्रकार यह रामकथा-मंदाकिनी व्यक्तियों, देशों और भिन्न-भिन्न समाजों के दुष्ट विचारों-समस्याओं के जंगलों से आगे बढ़कर कालानुसार परिस्थिति जन्य परिवर्तनों के पहाड़ों के बीच सुख-दुःख के उतार-चढ़ाव से, यन्त्रिक ढंग से चलायमान काल रूपी मैदानों से बहकर हर दशा में दिशा में मानवसमूह को प्रभावित करती ही रहेगी।

राम विग्रहवान (मूर्तिमान) धर्म हैं। राम जीवन में घटित सुख और क्लेश सब सहते हुए प्रतिकूल स्थिति में भी धीरता से धर्म पर अड़िग रहे। उनका महोनत व्यक्तित्व पग-पग पर मार्ग-निर्देश करने वाला तेजःपुंज है। चाहे कितने ही हजार वर्ष बीत गये हों, चाहे मनुष्य ने कई क्षेत्रों में बहुत बड़ी तरक्की प्राप्त की हो, रामायण आज भी प्रासंगिक है। राम मन-मंदिर में प्रतिष्ठित भगवान ही नहीं, बल्कि कष्ट-परंपरा में फँसी मानवालि को हाथ का सहारा देकर आगे ले चलने वाले नेता भी हैं। आज का युग वेदयुग नहीं है। आधुनिक मनुष्य के पास श्रुति-स्मृति पढ़ने की फुरसत नहीं है। पढ़ने-समझने के लिए आवश्यक पांडित्य भी नहीं है। लेकिन रामायण रूप में अवतरित वेद और उसका परमार्थ सभी भारतीयों ने ग्रहण किया।

ग्रामीणों के लिए सीता-राम-माँ-बाप हैं। आचार्य बिरुदुराजु रामराजु के शब्दों में "सुख हो अथवा दुःख, राम-नाम-स्मरण के सिवा हमारे लिए दूसरा क्या है? चरण-तल में कांटा गड़ने से और हथेली पर वैकुण्ठ मिलने से रामचन्द्र जी जिह्वाग्र पर घर कर लेते हैं। पूरे भारत में यह आम बात है। रामायण कथा का असीम प्रभाव आन्ध्र ग्रामवासियों पर है। वनवास के दौरान सीता- राम ने कुछ दिन गोदावरी तट पर निवास किया। माना जाता है। कि पर्णशाला के प्रांगण में लगाये गये चेल-पौधों को देने के लिए राम-लक्ष्मण जल से आये। तब सीता माता ने पानी डालकर थांवला बना दिया। उस समय इन तीनों का वार्तालाप गोदावरी-माता ने अपने हृदय में निक्षिप्त किया। तब से लेकर अब तक गोदावरी को झरङ्गा ध्वनि सुन रहे देहातियों को जितने रामायण-रहस्य जात है, संभवतः उतने औरों को मालूम नहीं। उनके मुँह रामायण की शाखा प्रशाखाएँ फूट निकलीं।

ग्रामीणों ने सीता-राम के साथ तादात्म्य की स्थिति प्राप्त की। इस जनता के लिए सीता राम अवतार-पुरुष नहीं हैं। इनका अपना जीवन ही सीता-राम का जीवन है। अपने दुःख-सुख को उस पुराण-दम्पति के के सुख-दुख है रूप में कल्पित करके इन लोगों ने तल्लीनता का अनुभव किया। इनकी भावना है कि अपने दैनंदिन जीवन को प्रत्येक रेखा, हर एक कंपन और प्रत्येक विश्वास सीता- राम के हैं।

मुद्रित लोकरामायण ही बहुत हैं। बाकी जो छपे नहीं, केवल जनता की जीभ पर नाचने वाले ऐसे लोकगीत पता नहीं, कितने और हैं। कृचकोंड रामायण, शारद रामायण, धर्मपुरि रामायण रामकथा सुधार्णव, मोक्षगुण्डरामायण, अध्यात्मरामायण, चिट्टि रामायण, वा सूक्ष्मरामायण, संक्षेपरामायण, श्रीरामदंडक, लंकासारधि, रामायणगोब्विपाट, श्रीरामजाविलि, अडवि गोविंदनामालु, शांत गोविन्दनामालु, पेंड्लि गोविंदनामालु, सेतु गोविन्दनामालु आदि में पूर्णतः या संक्षेप में रामकथा वर्णित हुई। शांता कल्याणमु, पुत्रकामेष्टि, श्रीरामजननमु, राघवकल्याणम्, सुंदरकाण्ड पदं, ऋषिआश्रम, सुग्रीव विजयमु, अंगदरायबारमु, लक्ष्मणमूर्छा, श्रीराम पट्टाभिषेकमु, लक्ष्मणदेवर नव्वु, ऊर्मिलादेवि निद्र, कुशलवयुद्धमु आदि रामकथा के कुछ भागों पर आधारित हैं।

ऐसे लोकगीत बहुत सारे हैं जिनमें सीता - माता वण्य विषय है। सीता-माता के सुख-दुख लोंगे के जीवन में अंकित हैं। सिर्फ एक सीता के बारे में ही अनेक में अंक में प्रचलित हैं। ये सब गांवों में प्रचार में हैं। यदि कहें तो अत्युक्त नहीं इतना विषय - वैविध्य पंडितकविकृत रामायण में नहीं मिलता। परिनिष्ठित साहित्यिक शैली में रचित रामायणों पर शिक्षित लोगों का जितना विश्वास है, उतना ही विश्वास लोकप्रचलित रामगाथाओं पर देहातियों का है।

रंगनाथ, भास्कर, गोपीनाथ आदि रामायणों में कई अवाल्मीकीय अंश हैं। निश्चित रूप से कहना कठिन है कि इन रामायणकारों ने सामान्य जनता से उपर्युक्त अंश रहण किये किंवा उक्त रामायणों से ग्रामीणों ने ग्रहण किये। यह मानना समीचीन होगा कि एक वर्ग से दूसरे वर्ग ने परस्पर विनिमय किया होगा। प्रथम तेलुगु रामायण रंगनाथरामायण में जो वाल्मीकीय अंश हैं, उनसे चौगुनी गाथाएं ग्रामगीतों में हैं।

कुशलव कुच्चल चरित्रः

यह लम्बा कथागीत है। दशरथ के राज्यपालन से सीतादेवी के भूगर्भ प्रवेश की कथा इसमें है। इसकी कुछ कल्पनाएँ इस प्रकार हैं। रावण वध के बाद सीता-राम अयोध्या पहुँच गये। सीता देवी ने पुरस्त्रियों से जो बातचीत हो की है, वह नारी-स्वभाव के अनुरूप है और इसलिए निसर्ग रमणीय है। सीता-माता उन स्त्रियों से कुशल-मंगल पूछती हैं- "बहनो! जब मैं जंगलों में थी, तब तुम लोग मुझे याद करती थीं या भूल गयीं। हे कांता ! तुम्हारी छोटी वाली बिटिया तब बहुत छोटी थी। अरे, अब तीन बच्चों की माँ बन गयी? कम से कम कल तो मेरे पास ले आओ"। उन स्त्रियों ने सीता जी की सराहना इस प्रकार की- "यह देवी चौदह बरस जंगलों में घूम- घूम-घूम कर यहाँ वापस आयी। हम सबको भूली नहीं।"

एक दिन सीता ननद शांता से बात कर रही थी। * बार-बार बुलाने पर भी राम के पास नहीं गयी। राम नाराज हो गये। लक्ष्मण से अपने धनुष बाण मंगाकर उनको दासियों के रूप में बदल दिया। जब वे परिचारिकाएँ राम की सेवा कर रही थीं, वहाँ सीता गयी। सीता ने राम से कहा- "मेरे पिता जी ने मुझे आपके हाथों में दिया, यह समझ करके कि आप परनारीविमुख हैं। आपकी परनारीविमुखता इस तरह प्रकट हुई।" सीता के वचन सुनकर ऐक दासी कहती है- जानकी, तुम अब कहाँ से आयी हो ? राम के साथ हम हमेशा रही है। जंगल कहाँ से से तुम दूर हो गयी। राम तब हमारे साथ प्रसन्नता से रहें हैं। तुम कहाँ की हो सीता?" शांता घटना स्थल पर आयी । सारी बात समझ गयी। पति-पत्नी की संधि करायी। यह कल्पना नारी- मनोविज्ञान को रमणीय ढंग से प्रदर्शित करती है।

हम सब जानते हैं कि राम ने पूर्ण गर्भिणी पत्नी का परित्याग किया। वाल्मीकि रामायण से लेकर लगभग सभी रामायणों में इसका कारण लोकनिंदा बताया गया है। भवभूति के उत्तररामचरित में राम से अनुभूत दारुण दुःख करुणरसात्मक ढंग से चित्रित हुआ है। ग्रामीणों ने इसका एक अद्भुत कारण बताया। यह प्रसंग- मानव मानसिकता और लोक-स्वभाव को उजागर करता है।

राम रावण युद्ध में कई लोग मर गये। लेकिन ईर्ष्यालु शूर्पणखा बची रही। नाक कान कटने के बाद भी राम पर उसका मोह कम नहीं हुआ। सीता को अपने मार्ग की अड़चन मानकर शूर्पणखा संन्यासिन बनकर अयोध्या पहुँची। राम-लक्ष्मण के दर्शन करके अपनी इन्द्रजाल- विद्या को उनके सामने प्रदर्शित किया। राम आखेट के लिए वन जाने की जल्दी में था। लक्ष्मण के मना करने पर भी राम ने आदेश दिया, इस सन्यासिन को शान्ता और सीता के पास ले जाओ। अन्तःपुर में मायावी सन्यासिन का स्वागत सत्कार किया गया। शान्ता को यह अच्छा नहीं लगा। सीताजी ने तो रत्न, माणिक, सोने की रेशमी साड़ियाँ, गहने आदि देकर उस मायाविनी का सत्कार किया। सन्यासिन ने इन अमूल्य रत्नों और वस्त्रों का उपहार ठुकरा दिया। उसने सीता से मांगा कि रावण का चित्र बनाकर दोगी तो मैं इस दुनियाँ में जीवित रहूँगी। "सीता जी का दिल दहल उठा। समझ में नहीं आया कि ऐसी विपरीत इच्छा क्यों। अन्तःपुर की अंगनाओं का दबाव बढ़ने लगा। सीता ने कहा- "मैं दस महीना बन्दी रही, लेकिन उस पापकर्मी को आंखों से देखा नहीं। उसको पिता- तुल्य समझा। उसके पैर का अंगूठा मात्र जानती हूँ" सीता को वह अंगूठा चित्रित करके देना पड़ा। शूर्पणखा ब्रह्मा के पास गयी, मिन्नत की "भैया मरके छः महीना हुआ। तब से भैया को देखा नहीं। भैया के बदले इसी को देखती रहूँगी। इसे आयुष्य दें।" ब्रह्मा ने उसका रोना सच्चा समझा (झूठ-मूठ का नहीं)। चित्रपट में प्राण डाले।

शूर्पणखा चित्र को अयोध्या में छोड़कर चली गयी। वह चित्रपट जानकी के सामने खड़ा होकर - अरी, आओ,लंका चलेंगे। सीता को पकड़कर आफत मचायी। उसे को पकड़ के खींचने लगा।" अतःपुर की स्रीयों ने उसे कुएं में डाल दिया, ऊपर पत्थर रख भी कोई फायदा नहि हुआ। तंग आकर सीता जी रामी कि कसम खाकर को चित्रपट पलंग पर गद्दे के नीचे दबाके रखा। किसी ने राम को यह बात नहीं बतायी। रात में राम पलंग पर बैठकर सीता से सरस वार्तालाप करने लगे। चित्रपट ने राम को नीचे धकेल दिया। राम विस्मित होकर सीता से पूछते हैं "प्रियाएँ हंसती है, खेलती हैं, गाती हैं, धकेलना कोई मजाक है?" तब रावण का चित्रपट राम के सामने आ खड़ा हुआ। राम ने सीता पर संदेह किया। फिर सीता जी को वनवास करना पड़ा। ग्रामीणों ने सीता-परित्याग का यह कारण कल्पित किया। कहते हैं कि ऐसी कल्पनाएँ जैन रामायणों, बंगाली रामायणों और तमिल ग्रामगीतों में हैं।

लंकायागमु :

यह गीत बहुल-प्रचार में हैं। वनगमन के समय लक्ष्मण भी राम के साथ जाने को तैयार हो गये। सुमित्रा ने आशीर्वाद देकर लक्ष्मण से कहा "लखमन! राम को पिता और सीता को माता समझो। सुबह-सुबह उठकर भाभी के चरणों को प्रणाम करो। बगीचे के फल लाकर दोने में भेंट रूप में दे दो। चौदह साल बीत जाने पर तुम लोग हम से मिलने आओ।" कौशल्या ने राम से कहा कि वह भी वन चलेगी। किन्तु सुमित्रा पुत्र वियोग के लिए तैयार हुई और आशीर्वाद दिया। भाई और भाभी की सेवा का परामर्श दिया। यहाँ सुमित्रा का धीर-शांत गुण प्रमुख है। वास्तव में यह भाव वाल्मीकि रामायण में है, यथा-

"रामं दशरथं विद्धि, मां विद्धि जनकात्मजाम्।
अयोध्याम् अटवीं विद्धि, गच्छ तात यथासुखम्।।"
इस गाथागीत में रावणकृत पातालहोम की योजना है जो वाल्मीकि रामायण में नहीं है।

पुत्रकामेष्टि :

यद्यपि गीत का नाम पुत्रेष्टि (यज्ञ) है, तो भी राम आदि भाइयों के विवाह तक की कथा इसमें है। इसमें धनुर्भग के पहले ही राम सीता से मायावेष में मिलते हैं। सीता फूल तोड़ने फुलवारी जाती है। वह है, योगी को पूजा करके पूछती हैं कि योगी किसके शिष्य हैं, राजा को तेजस्विता से युक्त होकर इस छोटी अवस्था में ही संन्यासी क्यों बने। योगी रूप में राम सीता के भवि पति बनेंगे। अन्त में अपने को सही-सही प्रकर करते हैं। कालिदास के कुमारसंभव में भगवान शिव मुनिब्रह्मचारी वेष में आकर पार्वती से बात करते हैं। इसे प्रकार सीता राम का विवाहपूर्व प्रणय-प्रसंग इस लोकगीत भास के यज्ञफल नाटक में, तमिल के कंबरामायण और रामचरितमानस में संयोजित है, जो वाल्मीकिरामायण में, में नहीं है।

ऊर्मिलादेवी की निद्रा

वनवास के बाद भी लक्ष्मण बड़े भाई साहब को सेवा में लगा रहा। बहन ऊर्मिला का मन जानने वाली सीत ने राम से लक्ष्मण को अनुमति दिलाई। लक्ष्मण देर किये बिना तुरन्त शयन-गृह में पहुँचा। लंबे अन्तराल के बाद आने के लिए क्षमा मांगे बिना शय्या पर बैठकर ऊर्मिला से बोलने लगा, "भामिनी ! चांद तुम्हारे प्यारे मुख का सेवन करना चाहता है।" चौदहों बरस निद्रा के लिए ही अभ्यस्त ऊर्मिला मूंदी आंखें खोले बिना पड़ी रही। उसको लगा कि कोई परपुरुष आया है। ऊर्मिला इस प्रकार मना करती है-
"भैया! तुम कौन हो ? इतना जुल्म करने आये।
गली गली ढूंढते हुए इतनी गलती करने आये।
 सब की आंख बचाकर एकान्त में आये।
 हमारे जनक सुनेंगे तो तुम्हारी खबर लेंगे।
दीदी और जीजा सुनेंगे तो तुम्हारी जान निकालेंगे।
 बहन और देवर सुनेंगे तो तुमको जीने नहीं देगे।"
 
 यहाँ ऊर्मिला की लज्जा और सौशील्य अभिव्यक्त

हुए हैं। वह परेशान हो गयी की ऐसी दुर्गति हुई।  

"इज्जतदार खानदान में धब्बा लगा, हाय मैं क्या, करूँ?
यशस्वी वंश को अपयश मिला, अब मैं क्या करूँ?"

ऊर्मिला बताती हैं कि, परनारी को चाहने से रावण, देवेन्द्र और कीचक (विराट का साला) कैसे मटियामेट हुए। वह फटकारती है- मेरी जैसी माँ तुम्हारी नहीं ? तुम साथ नहीं जनमे ?

एकान्त में पति, पत्नी के बालजाल में बेला फूल संवार रहे थे। तब वह पूछती है- -

 "सिंहविक्रमी आपके रहते, सीता कैसे हर ली गयी?
 राज्याधिपति आपके रहते सीता कैसे अपहृत हुई"
 आमोद-प्रमोद की संयोग दशा में भी ऊर्मिला के हृदय में बहन की करुण कथा हिलने-डुलने लगी।

लक्ष्मणदेव की हँसी : -

अयोध्या लौट आने के बाद समस्त देवताओं के समक्ष सीता राम का पट्टाभिषेक (राजतिलक) समारोह संपन्न हुआ। भरी सभा में लक्ष्मण खिलखिला उठे। सभी सदस्य अपनी-अपनी गलतियाँ सोचकर कुम्हड़े के चोर की तरह कंधे टटोलने लगे। राम बेमतलब की हँसी समझकर नाराज हुए, तलवार निकालकर लक्ष्मण से पूछा, हँसी का कारण क्या है ? लक्ष्मण ने जवाब दिया- "भैया ! वनवास के समय निद्रा मेरे पास आयी। मैंने कहा, तुम अभी अयोध्या जाओ और राम के राजतिलक के बाद मेरे निकट आओ। एक क्षण भी देर नहीं करके मुझ पर सवार हुई। इसलिए मुझे हँसी आयी।" राम का दिल पानी-पानी हो गया। राम, सोते हुए लक्ष्मण के पांव पलोटने लगे। गाढ़ी नींद में भी उठकर लक्ष्मण ने राम के चरण पकड़े।

ऐसे लोकगीत और कितने ही हैं। ऊर्मिला और लक्ष्मण की त्याग-निष्ठा और सेवाभावना की जो जयपताकाएँ आन्ध्र महिलाओं ने ऊपर उठायीं, वे दो लोकगीत हैं ऊर्मिला देवी की निद्रा और लक्ष्मणदेव की हँसी। प्रायः सभी रामायणकारों ने ऊर्मिला की उपेक्षा की। किन्तु आन्ध्र की देहाती स्त्रियाँ ऊर्मिला को नहीं भूलीं। सीता को तो रामकथा में अग्रस्थान दिया। किन्तु ऊर्मिला की अश्रुपूर्ण कहानी में भँवरजाल बनकर इन नारियों की आंखों में गोदावरियों की सृष्टि की। मैथिलीशरण जी का 'साकेत' और अन्य कवियों के ऊर्मिल काव्यों का बीज यही है।

ग्रामीणों ने रामायण और उसके प्रधान पात्रों के विषय में अपनी मानसिकता के अनुरूप और लोकव्यवहार के अनुसार ढेर सारी चमत्कारपूर्ण कल्पनाए की हैं। किसी भी कथागीत में वर्णनों की भरमार से प्रसंगों को घसीटा नहीं गया। सरलता, क्षिप्रता और लयात्मकता तेलुगु लोकगीतों की विशिष्टताएँ हैं।

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-डॉ. टी. वाणीकुमारी
(संदर्भ - साहित्य परिक्रमा - जनवरी २०१२ - भाव रुप राम )

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