Sunday, 14 January 2024

तमिल भाषा में भावरूप राम-कंबन रामायण के सन्दर्भ में

आदौ राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं कांचनम्।  वैदीहीहरणं जटायुमरणं, सुग्रीवसंभाषणम्।।
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं, लंकापुरीदाहनम्।  पश्चाद् रावण कुम्भकर्ण हननम्, एतद्धि रामायणम्।।

धर्म प्राण देश भारत में भक्ति साहित्य एक कालजयी साहित्य बनकर दिन दुगुना रात चौगुना होकर निरंतर उन्नति के साथ, नैतिक धार्मिक मूल्यों की वृद्धि करते हुए आगे बढ़ रहा है। भारतीय साहित्य में प्राप्त रामायण का मूलाधार संस्कृत के वाल्मीकि रामायण होने पर भी विभिन्न प्रदेश के विभिन्न कवि गणों ने मर्यादा पुरुषोत्तम, सत्य- शील-सौंदर्य का प्रतिरूप श्रीराम की उज्वल चारित्रिक विशेषताओं का चित्रण, अपनी-अपनी कल्पना के मधुर रस से भारतीय काव्य नायक, एक पत्नी व्रती भारत के आदर्श पुरुष श्रीराम के कथा प्रसंगों में वैविध्यता लाते हुए सोने में सुहागा मिला दिया है।

तमिल रामायण के अग्रणी कवि कंबन मूलतः विष्णुभक्त थे। उन्होंने कंब रामायण के साथ शठगोप अंदादि (नम्मालवार को स्तुति) की भी रचना की। कंबन के श्रीराम भी अन्य कवियों के श्रीराम की तरह विश्व बन्धुत्व की कामना करने वाले हैं। उसमें ऊँच-नीच, जाति-पाति का भेदभाव नहीं। चक्रवर्ती के परम प्रिय, लाड़ला बेटा श्रीराम का निषाद राजा गुह से स्नेह होना पवित्र प्रेम का, अछूत्तोद्धार का प्रतीक है। श्रीराम मात्र मनुष्य के मित्र नहीं बल्कि पक्षी जटायु, संपाती, वानर-सुग्रीव व राक्षस-राजा विभीषण, भालू जांबवन्त के भी मित्र रहे। इतना ही नहीं शबर जाति की स्त्री के जूते बेर खाकर यह सिद्ध किया है कि प्रेम में उत्कृष्ट निर्मलता होती है।

कंब रामायण में अयोध्या नगरवासियों के प्रति राम के असीम प्रेम का उल्लेख करते हैं। कवि कंबन कहते हैं- "श्रीराम जितने आकार में अतुल मनोहर हैं उतने ही गुणों में भी। विद्याभ्यास के लिए भाइयों के साथ वशिष्ठ जैसे आचार्य के पास आते जाते वक्त सामने आयी जनता से श्रीराम पूछते "

एदिर वरुम् अवरगलै, रामैयुडैय इंरैवन
मुदिर तरु करुणैयिन् मुगमलर ओलिरा
एदुविनै ? इटरिलै ? इनिदुनुम मणैयुम्
मदितरु कुमररुम् वलियर कोल।
(मेरा उद्धार करने वाले मेरे प्रभु श्रीराम तेजस्विता एवं कमल जैसे प्रकाश पूर्ण सुन्दर बदन से, प्रेमादर से पूछते हैं- कौन से काम के लिए जा रहे हैं? कष्ट तो नहीं हुआ ? घर में माँ कुशल हैं? बुद्धिमान आपके भ्राता लोग कुशल हैं?") इससे पता चलता है कि बचपन से वे प्रेम की मूर्ति रहे।

ताड़का-वध के पहले श्रीराम स्त्री को मारना पाप सोचकर गुरु की ओर देखते हैं। तब महर्षि उसे मारने का आदेश देते हैं तब श्रीराम अत्यंत विनय भाव से कहते "अधर्म होने पर भी अगर श्रद्धेय गुरु आप आदेश दें तो मैं उसका पालन करूँगा क्योंकि आप सत्यशील हैं। इससे राम की उत्कृष्ट गुरु भक्ति का बोध होता है।

वनवास जाने का आदेश जब कैकेई देती है उस प्रसंग का वर्णन करते हुए वाल्मीकि राम से कहलवाते हैं कि मैंने कौन-सा अपराध किया ताकि मुझे पिताजी वनवास भेज रहे हैं? लेकिन कंबन द्वारा चित्रित राम उससे कई गुना श्रेष्ठ है। वे कैकेई से कहते हैं
पिण्णवण् पणियेणराल नंपुणि
मरुप्पेणो, तंदैयुम् तायुम् नीरे।
"आदेश तो पिताजी क्या आप स्वयं दीजिए, उसका अनुसरण मैं तुरंत करूँगा, क्योंकि मेरे माँ-बाप सब कुछ आप ही हैं।

श्रीराम के साथ वनवास जाने को तैयार होने वाले सौमित्री ने राम से कहा
 नीर उल एणिन् उल मीनुम् नीलमुम्
 पार उल एणिन् उल यावुम् पारपुरिन्
 नार उल तनु उलाय नाणुम् सीतैयुम्
 यार उलर एणिन् उलैम् ? अरुलुवाय एणरान्
लक्ष्मण अपने को मछली से, सीता को नीलोत्फल पुष्प से तुलना करते हुए कहते हैं  "अगर आप नहीं तो मैं और सीता मैया जल रहित भीन व नीलोत्फल पुष्प जैसे हो जायेंगे। अगर जगत् होगा तो सकल जीव राशियाँ होगी। मैं और सीताजी किसके लिए जिएं आप ही बताओ।

अखिलाण्ड कोटि ब्रह्माण्ड के नायक श्री महाविष्णु अति साधारण मानव के रूप में पृथ्वी पर आये। चक्रवर्ती के बेटे श्रीराम काषाय वस्त्रों में निषादराज गुह को प्यार भरे नयनों से गले लगाकर अनुज कहते हैं। कंबन के श्रीराम गुह से कहते हैं।
"तुण्पुलतेनिन अण्रो सुकमुलदु अदुवणिर
पिन्पुल तिडैमण्णुम् पिरिवुलदेन उण्णेल
मुनपुलम् ओरु नालवेम् मुडिवुलदेन उण्णा
अण्बुल इनि नाम और ऐवर उत्तरोणाम्"
"इसके पहले हम चार भाई थे, अब तुम्हारी वजह से हम पाँच बन गये-कहकर श्रीराम ने उसे प्यार से गले लगाया।" इससे पता चलता है कि सनातन काल में ही हिन्दू धर्म में राम द्वारा छुआछूत व जातिगत भेदभाव का निर्मूलन हुआ था। पारिवारिक रिश्तों में निर्मल मन, त्याग भाव हो तो शांति व सुख मिलेगा। इसी भाईचारे को श्रीराम ने समाज में उसी समय स्थापित किया है। कंबन द्वारा चित्रित श्रीराम वाल्मीकि के श्रीराम से ज्यादा भरत के प्रति प्रेम उत्साह, आदरभाव, मर्यादा, कोमल भाव सब कुछ दिखाते हैं। कंबन ने भरत का चरित्र चित्रण करते समय उसे श्रीराम से भी अधिक महत्व दिया है। दौड़-दौड़ कर श्रीराम से मिलने आये भरत को देखकर गुह उसका वर्णन इस प्रकार करते हैं-
"नंबियुम् एन नायकनै ओक्किणरान्
अयल निण्रान्
तंबियै ओक्किणरान् तववेडम् तलैनिणरान्
तुण्बम ओरु मुडिविल्लै दिसै नोक्कि तोषु किणरान्
एंवेरुमान पिन पिरन्दार इषैष्परो पिषैप्यु

तपोवेश में भरत खड़े हैं। उनका चेहरा दुःख सागर में डूबा हुआ है, राम जिस दिशा में गये उनका दण्डवत् प्रणाम करते आ रहे हैं। मेरे भगवान के अनुज कभी भी अपराध नहीं कर सकते।

बालि के माध्यम से भी कंबन श्रीराम के प्रति रखा अपार भक्ति भाव को प्रकट करते हैं। श्रीराम के बाण छूने मात्र से उसके अंदर देवत्व आ जाते हैं। उसमें अपने भाई सुग्रीव को भी क्षमा करने की क्षमता आ जाती है। इसीलिए कंबन का बालि कहता है। अगर मेरा भाई सुग्रीव कहीं अपराध कर बैठता है तो मुझ पर छोड़ा रामबाण आप उस पर मत छोड़िये राम ! तमिल के आलोचक व उपदेशक कीरन उसे 'देयव बालि' से संबोधित करते हैं।

सुग्रीव जब अपना वादा भूल जाता है और सीताजी को ढूँढने में देरी करता है तब लक्ष्मण सुग्रीव से मिलने गुस्से से निकल जाते हैं। तब श्रीराम के करुणापूर्ण हृदय का चित्रण कंबन के शब्दों में
"नीदियाग निगषन्दैनै निणरदु
वेदियाद पोषुटु वेकुंठवन
खादियादु अवर सोल तस्तणै
पोदियादि येण्राण पुगष पूणिणान् ।
(हे लक्ष्मण! तुम अपने क्रोध को वहाँ जाकर मत दिखाना शांति से बातें करो ताकि तुम्हारी बातों के अन्दर छिपी हुई नीति का बोध उसे हो जाए। अगर उसके विचार हमारे विचार से भिन्न रहे तो क्रोधित होकर उनका वध नहीं करना, मुझे सूचित करना)

चरित्र निर्माण करने में भी कंबन आदिकवि वाल्मीकि से एक कदम आगे हैं सीता-हनुमान संवाद में वाल्मीकि की सीता कहती है-

यदहं गात्र संस्पर्श रावणस्य बलाद्गता
अनीशा किं करिष्यामि विनाथा विवशा सतीं ।।

कंबन का कहना है अगर कोई परपुरुष मेरा (सीता का) स्पर्श करेगा तभी मेरे तन से प्राण निकल जाते हैं। इसीलिए दुष्ट रावण मुझे भूमि सहित यहाँ लेकर आया। बाकी सारी रामायणों में रावण सीता को पकड़कर ले जाने का प्रसंग है जबकि कंबन ने भूमि सहित सीता को रावण ले गया कहा था यहां कंब रामायण की विशिष्टता और शीलवती नारियों की पवित्रता। उसकी पुष्टि में सीता रावण के शाप को पेश करती है।
त्तीण्डुवान एणिन् इत्तणै सेण् पकल
इंण्डुम् ओ उयिर मेय्यिन् इयैप्पिन् मुन
माण्डु तीरवन एण्रे निलम् वण्मैयाल
कीण्डु कोण्डु एषुन्दु एसीनेन कीषमैयान

कंबन ने अपनी कथावस्तु में, प्रसंगों में थोड़ा बदलाव लाने का प्रयास किया। कंब-रामायण में पहले राम रावण युद्ध, बाद में कुंभकर्ण से युद्ध, उसके बाद नाग पाश का वर्णन अंत में रावण वध आतें हैं। पहली बार के राम-रावण युद्ध में रावण के रथ, अश्व, किरीट, धनुष, बाण आदि सब कुछ श्रीराम द्वारा नष्ट किये जाते हैं। अकेले खड़े शत्रु रावण को देखकर श्रीराम उसका वध न करके कहते हैं "धर्म के सिवा अधर्म से देवता लोग भी युद्ध में जीत नहीं सकते। मैं अभी तुम्हारा वध कर सकता, लेकिन तुम अकेले निहत्थे होकर खड़े हो। अभी जाकर कल अपने रिश्तेदार व सहायक सेनाओं के साथ वापस आकर युद्ध करो। आज जाकर कल आओ 'इक पोय् नालै वा'। शत्रु के प्रति भी श्रीराम के क्षमा गुण का परिचायक है।

एक और स्थल पर युद्ध भूमि में कुंभकर्ण को देखकर विभीषण हाथ जोड़कर वंदना करते हैं तब कुंभकर्ण से कंबन श्रीराम की महिमा को कहलवाते हैं-
"ऐयने, उयवदकुं माराग कडैक्कलमागि यांगे
उयकिलै येण्णिन् माट्रिण्वुरक्करायुल्लो मेल्लाम्
एयकणै मारियाले चिरन्तु पाषपडुडुम् पट्टार्य
कैयिणा लेण्णीर नलिग कडन कषिप्पारै काट्टाय।"
 "अनुज ! हम सब असुर लोग राम नामक बाण- वर्षों से मर जायेंगे। अगर ऐसा हुआ तो तुम अयोध्या के राजा श्रीराम की शरण में ही रहकर तुम्हारे हाथों से तिलांजलि हमें देकर पितृ तर्पण करो। कुंभकर्ण श्रीराम की प्रशंसा करते हुए उसे जगत्प्रभु मानता है-

'कमल पर वास करने वाले वरदानी ब्रह्मदेव से प्राप्त अखण्ड वर से विभीषण तू ने धर्म मार्ग को अपनाया। १. जब तक यह युग होगा तब तक तुम चिरंजीवी बनकर रहेगा। जगत्प्रभु श्रीराम के पास रहने से तुम्हारी कीर्ति बढ़ जायेगी। युद्ध में मेरा मरण तो अनिवार्य है। यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण में नहीं। अध्यात्म रामायण तुलसी रामायण और कंब रामायण में हैं। रथ पर माया सीता को बिठाकर निकुंबिल यज्ञ मेघनाथ द्वारा करने वाले प्रसंग में ३. भी कंबन ने अपनी कल्पना को मिलाया।

श्रीराम से बिछुड़कर अशोक वन में उनकी स्मृतियों में दिन बिताने वाली सीता मैया मारुति से कहती है। उनका प्रेम राम के प्रति, राम का प्रेम उनके प्रति वर्णनातीत है। शरीर ४. और प्राण का संबंध कहे तो कौन शरीर, कौन प्राण कहना कठिन है वही दोंनों का संबंध वह श्रीराम के एक पत्नि व्रत को याद करके बार-बार बलि हो जाती है। कंबन के शब्दों में..
"वन्दु एणैकरम पद्रिय बैकलवाय्
 इन्द इप्पिरविक्कु इरुमादरै
सिन्वैयालुम् तोडेन एण्र सेण्वरम्
तन्द वात्तै तिरुच्चेवि चाटुवाय।
(मुझ से विवाह करते समय मर्यादा पुरुषोत्तम ने कहा इस जन्म में दो स्त्रियों को मन से भी नहीं सोचूँगा।। सीता के सिवा कल्पना में भी उसके मन में दूसरी स्त्री के लिए होने वाली सोच की भी अनुमति नहीं।)

कंबन ने रामायण के अलावा अपनी रचना शठगोष अन्दादि में भी राक्षस कबंध के माध्यम से श्रीराम को जगत् रक्षक माना है।

भाषाएँ भारत में अलग हो सकती हैं लेकिन रामायण के काव्य नायक सारे कवियों की दृष्टि में मर्यादा पुरुषोत्तम्, सत्यशील, विष्णु अवतारी दैत्य नाशक, जगद कल्याणकारी श्रीराम एक ही हैं। सभी के भावों में व्याप श्रीराम एक ही हैं। यह पवित्र भारतीय भक्ति साहित्यिक आत्माओं का संगम है। जय श्रीराम

१- संदर्भ ग्रन्थ
रामनै दरिसिप्पोम्
६-काण्डम अरिउट कट्टुरे
प्रकाशक: कंबन कषगम् '
२-मुक्कवि कण्ड काप्पियम्
(दूसरा भाग)
डॉ. टी.जी. अनंत सुब्रह्मण्यम् टी.टी.डी. प्रकाशन १९९०
३-काव्य रामायणम् -
के. रास. श्रीनिवासन्
प्रकाशक-भारत सरकार मंत्रालय- शिक्षा व युवा सेवाएँ
४-कंबरामायणम्
-मूलमुय-उरैयुम्

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-डॉ. लक्ष्मी अय्यर
(संदर्भ - साहित्य परिक्रमा - जनवरी २०१२ - भाव रुप राम )

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Saturday, 13 January 2024

१०८ रामायण के रचयिता

आदौ राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं कांचनम्।  वैदीहीहरणं जटायुमरणं, सुग्रीवसंभाषणम्।।
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं, लंकापुरीदाहनम्।  पश्चाद् रावण कुम्भकर्ण हननम्, एतद्धि रामायणम्।।

कोंकण प्रदेश के रत्नागिरि जिले में राजापुर नाम की तहसील में का 'सौदल' नाम का एक छोटा गाँव है। कवि मोरोपंत के वंशज इसी गांव में निवास करते थे। ये जामदग्नि गोत्र के कण्हाड़े ब्राह्मण थे। इनके पिताजी अपने मूल गाँव से कोल्हापुर के राजा के यहां नौकरी के लिए आये तथा वहां से पूना के पास 'बारामती' नाम के स्थान पर नौकरी की तलाश में आये। मयूरकवि का जन्म कोल्हापुर के पास पन्हालगढ़ (पन्हाल) में हुआ। प्रारम्भिक विद्याध्ययन पिता के सान्निध्य में हुआ। इनके गुरु के रूप में चार व्यक्तियों का उल्लेख स्वयं मोरोपंत ने किया है। हरिभट्ट वरेकर इनके कुलोपाध्याय थे। उपनयन के पश्चात ब्रह्मकर्म, विष्णु-सहस्रनाम स्तोत्र, बालबोध तथा मोडी अक्षर की शिक्षा • हरिभट्ट वरेकर से प्राप्त की। कोल्हापुर के प्रख्यात पंडित केशव पाध्ये तथा गणेश पाध्ये इन दो गुरुओं के पास आपने काव्य-नाटक-व्याकरण हथा अलंकार आदि की शिक्षा प्राप्त की। मोरोपंत की पत्नी का नाम साध्वी रमाबाई था। इन्हें तीन पुत्र व तीन पुत्रियाँ थीं। भगवद्गीता, सत्संग व तीर्थयात्रा तथा ग्रंथ प्रणयन में मोरोपंत का समय व्यतीत हुआ।

मोरोपंत की ग्रंथ सम्पदा: मोरोपंत ने १०८ (108) रामायणों की रचना की  है जिनमें से ९६(96) प्रसिद्ध हैं तथा १२(12) रामायणों का केवल उल्लेख प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त दो स्फुट प्रकरण अहिल्योद्धार प्रथम तथा अहिल्योद्धार द्वितीय क्रमशः गीति तथा साखी में लिखा है। स्फुट काव्यों में रामस्तव, रामप्रार्थना (ओवी तथा आर्या छंद में) रामरीति, मारुति स्तुति, रघुराजस्तव, रामप्रार्थना (दोहामदिरा) रचनाएं भी प्रकाशित हैं। ९६ प्रसिद्ध रामायणों में से ४६ अक्षरवृत्त में, ४५ मात्रा वृत्त में, ४ अनेकवृत्तों में, २ प्राकृत वृत्तों में और दो पद हैं। रामायणों का नामकरण कहीं वक्ता अथवा श्रोता के आधार पर किया गया है। जैसे वक्ता के नाम पर हनुमत् रामायण, सीतारामायण, श्रोता के नाम पर श्री गुरु रामायण। वृत्त के नाम पर - अश्वधारीरामायण, ओवीरामायण, तन्वी रामायण, पृथ्वीरामायण आदि। कुछ रामायणों का नामकरण गुणों के आधार पर किया गया है। जैसे विचित्र रामायण, भावरामायण, रम्परामायण, साररामायण, सन्दर्भरामायण आदि। अन्य रामायणों का नामकरण 'चित्रकाव्यगुण' के आधार पर है- जैसे स्तोत्ररामायण, मंत्र रामायण, मंत्ररामायण, निरोष्ठरामायण, धन्यरामायण, दामरामायण परन्तु रामायण आदि।

रामकाव्य (रामायण) के अतिरिक्त गीति, श्लोक तथा आर्यागीति छंद में महाभारत के अठारह पर्वो का प्रणयन किया है। द्वादशस्कंधात्मक मंत्र भागवत, गीतिछंद में मंत्रमय भागवत, कृष्णविजय उर्फ वृहदशम (पूर्वार्द्ध तथा उत्तरार्द्ध) दशमस्कंद मुख्यार्थ, स्कंदपुराणांतर्गत ब्रह्मोत्तरखंड के अतिरिक्त रामायण, महाभारत, भागवत, विष्णु पुराण मार्कण्डेयपुराणादि से चुनिंदा प्रकरणों पर रचना की है। जैसे- हरिश्चन्द्राख्यान, अवतारमाला, भीष्मभक्तिभाग्य, गोपीप्रेमोद्‌गार दुर्वास मिश्रा, सावित्रीगीत आदि। इसी प्रकार संत चरित्रवर्णन विषयक, नदी- स्थान वर्णन विषयक, देवता आदि की प्रार्थना स्तुतिविषयक ग्रंथ तथा संस्कृत में भी ग्रंथों का प्रणयन किया है।

काव्य चमत्कार की दृष्टि से उनकी कुछ रामायणें विशेष प्रसिद्ध हैं। वैसे तो संस्कृत शास्त्र में शब्दों के चमत्कार से युक्त काव्य को अधम काव्य कहा गया है, किंतु मोरोपन्त के काव्य उत्तम श्रेणी के ही काव्य हैं, क्योंकि इनके काव्यों का प्रणयन देवताविषयक रति से सम्बद्ध है और जब देवता आदि से सम्बद्ध रति काव्य में होती है, तब वह भाव कहलाता है। "रतिर्देवादिविषयः व्यभिचारी तथोंझिता भाव प्रोक्तः " और इस भाव का समावेश रसादि ध्वनि के अन्तर्गत हो जाता है। इस दृष्टि से रसादिध्वनि काव्य उत्तम काव्य की कोटि में अधिरोहित हो जाता है। मोरोपन्त की दस रचनाएं काव्य चमत्कार की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इन रचनाओं का अत्यंत संक्षिप्त परिचय यहां दिया जा रहा है।

चमत्कृतियुक्त रामायण

परन्तुरामायण - यह सप्तकान्दात्मक रामायण है। इस रामायण की प्रत्येक आर्या में परन्तु इस शब्द की योजना इस प्रकार की गई है कि वह अप्रासांगिक नहीं लगती। जैसे - 
तन्त्र परन्तु पुसे प्रभु सौमित्र म्हणे भला कळे सेवा। नमितां देखत हो तो मीं जींती हींच नूपुरे देवा ।।
सुग्रीव म्हणे वानर हृतदार परन्तु भी नसे कष्टी। तुज देवी भेटवितो, व्यसनीं धृति हितकरी, तमीं यष्टी।।

ओवी रामायण - इस रामायण की रचना इस प्रकार कुशलता से की गई है कि सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर वह ओवी भी दिखाई देती है।

मात्रा रामायण - वर्णमाला के अ से ज्ञ तक मराठी में सोलह स्वर तथा छत्तीस व्यंजन हैं। इस प्रकार कुल 52 (52) मात्राएं होती हैं। इन मात्राओं में ऋ लृ ल्ह इम् और ळ इन छः मात्राओं से प्रारम्भ होने वाले शब्दों का इस रामायण में समावेश नहीं है। शेष छियालीस  (४६) मात्राओं से प्रारम्भ होने वाली आर्याओं का यह रामायण है। इस मात्रा रामायण की विशेषता है कि इसका प्रत्येक पद्य कमयाः अकारादि क्रम से प्रारंभ होता है जैसे (
अजित प्रभु विविधचने  ..(१)
आदिपुरुष देव धरि .....(२)
इष्टार्थ गाधि सुत ने.....(३)
ईश्वरमुनिभार्येले. (४)

लघु रामायण - इस रामायण में केवल लघुमात्राओं का ही प्रयोग किया गया है। अर्थात् आ ई ऊ ए ऐ ओ औ इनका प्रयोग नहीं किया गया है-

प्रमुदितहृदय विभु कपिल पसरुनि भुज उठुनि सुचिर दृढ़ कपळि।  
सावुनि बहु तदुपकृतिभर मिरवि, सुयश विएवरि सकल जग धयळि।।

दिव्य रामायण - इस रामायण की रचना गीति छंद में की गई है। गीति छन्द में कुल तीस मात्राएं होती हैं। मोरोपन्त ने इस रामायण की रचना में प्रत्येक पंक्ति में केवल सोलह अक्षरों का ही प्रयोग किया इनमें दो अक्षर लघु व शेष चौदह गुरु हैं। गीति के प्रत्येक चरण का ११वां व १३वां अक्षर गुरु है
।

सौम्य रामायण - इस रामायण की रचना आर्यागीति छंद में की गई है। इस छंद की प्रत्येक पंक्ति में बतीस मात्राएं होती हैं। मोरोपन्त ने प्रत्येक आर्यागीति की प्रथम पंक्ति में सोलह दीर्घअक्षरों से द्वितीय पंक्ति बत्तीस लघु अक्षरों की बनाई है।

कैकेयीच्या पोटा आला, ठेवी रम्या आख्या प्याला, रघुवर दशरथ भरत असि सुकवि अहितमुख सुकवि कुगतिसहि चुकवि ।।

कविप्रिय रामायण - इस रामायण की रचना अखधारी वृत्त में की गई है। इसके प्रत्येक चरण में बाईस अक्षर होते हैं। इसकी प्रत्येक पंक्ति में दूसरा, नवां तथा सोलहवां अक्षर वही आवे ऐसी रचना की गई है।

व्हावे कृतार्थजनु जावे लयासी अघ यावे महागतिमना
ध्यावे विशुद्ध यश, भावे जगी न तरि, भावे दशास्थदमना
घ्यावे स्वतत्व भगावे असेचि शुचि, ठावे, असे गुरुमखे
परवे प्रभो म्हणुनि नांवे सदा जपत गावे चरित्रचि सुख।

विचित्र रामायण
- इस रामायण की रचना जलोद्गति वृत्त में की गई है। इस वृत्त के प्रत्येक चरण में बारह अक्षर होते हैं। (ज स ज स) मोरोपन्त ने प्रत्येक चरण के पांचवें, छठे, सातवें, आठवें अक्षर में अनुप्रास की योजना की है।

भवाब्धि सुकवि कविप्रिय करी, करीशत महामहादय हरी।
सुकीर्ति परमा रमाप मिरवी रखीदितमहा महास्पद नवी ।।

दाम रामायण - 'दाम' इस शब्द का माला अर्थ है। इस रामायण की प्रत्येक आर्या में प्रथम पंक्ति के अंतिम तीन कहीं कहीं चार अक्षर अगली पंक्ति के प्रारम्भ में आते हैं। इस प्रकार प्रथम तथा द्वितीय पंक्ति एक- दूसरें में माला के समान गूंथी हुई प्रतीत होती है। इसी प्रकार आर्या के अंतिम अक्षरों से अगली आर्या का प्रारम्भ किया गया है। इस प्रकार सम्पूर्ण रचना को गूंथा गया है।

समय कठिन जाणुनि घटकर्णा उठवी दशास्य तोखरची।
खरचित सुगध धरि, हरि मारुतिच्या प्रभा मुखापरची ।।
तो वरचील काय यूथप तत्कर्णघ्राण सुल तोडी खप।
तो डिखय तोवि रगडी, त्या मारी स्वजन वज्रकवच पल।।।

निरोष्ठ रामायण - प फ, ब, भ, म इन पांच ओष्ठय व्यंजनों का प्रयोग इस रामायण में नहीं किया गया है। सम्पूर्ण रामायण में 'राम' इस शब्द का प्रयोग ही नहीं हुआ है।

एकनिष्ठ सदार निघे चरणगति तयासि तात रथ धाड़ी।
सारथि गंगा तरतां त्यजि अजि ! न विषाद खेदही झाड़ी ।। ६

इस प्रकार मोरोपन्त कवि की काव्य प्रतिभा का परिचय पाठकों को इनकी चमत्कारपूर्ण कृतियों के माध्यम से होता है। वैसे इनका मंत्ररामायण काव्यगुणों की दृष्टि से विद्वानों में विशेष आदर प्राप्त होते हैं। इस मंत्र रामायण को उत्तम काव्य कहा जा सकता है। मोरोपन को रचनाओं का साहित्यिक दृष्टि से साथ ही रचना वैविध्य की दृष्टि से अपना विशेष महत्व हैं।

सन्दर्भ ग्रंथ सूची
१. गुरु माझे श्रीराम श्रीमत्केशव गणेश-हरि चवधे) गंगावकिली १०९) में केशवं श्री गणेशं। वंदे विद्या गुरु हरिम्। (संस्कृत मंत्र रामायण)
२. लघुरामायण, मोरोपन्त
३. सोम्यारामायण
४. कविप्रियरामायण
५. दामरामायण मोरोपन्त
६. निरोष्ठ रामायण


- सौ. हेमा गोविन्द गन्धे
(संदर्भ - साहित्य परिक्रमा - जनवरी २०१२ - भाव रुप राम )



Friday, 12 January 2024

Jai Shree Ram

आदौ राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं कांचनम्।
वैदीहीहरणं जटायुमरणं, सुग्रीवसंभाषणम्।।
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं, लंकापुरीदाहनम्।
पश्चाद् रावण कुम्भकर्ण हननम्, एतद्धि रामायणम्।।

.....This (The Ramayana) is the great, ancient epic of India. Rama and Sita are the ideals of the Indian nation. All children, especially girls, worship Sita. The height of a woman's ambition is to be like Sita, the pure, the devoted, the all-suffering! When you study these characters, you can at once find out how different is the ideal in India from that of the West. For the race, Sita stands as the ideal of suffering. The West says, "Do! Show your power by doing." India says, "Show your power by suffering." The West has solved the problem of how much a man can have: India has solved the problem of how little a man can have. The two extremes, you see. Sita is typical of India — the idealised India. The question is not whether she ever lived, whether the story is history or not, we know that the ideal is there. There is no other Paurânika story that has so permeated the whole nation, so entered into its very life, and has so tingled in every drop of blood of the race, as this ideal of Sita. Sita is the name in India for everything that is good, pure and holy — everything that in woman we call womanly. If a priest has to bless a woman he says, "Be Sita!" If he blesses a child, he says "Be Sita!" They are all children of Sita, and are struggling to be Sita, the patient, the all-suffering, the ever-faithful, the ever-pure wife. Through all this suffering she experiences, there is not one harsh word against Rama. She takes it as her own duty, and performs her own part in it. Think of the terrible injustice of her being exiled to the forest! But Sita knows no bitterness. That is, again, the Indian ideal. Says the ancient Buddha, "When a man hurts you, and you turn back to hurt him, that would not cure the first injury; it would only create in the world one more wickedness." Sita was a true Indian by nature; she never returned injury.

Who knows which is the truer ideal? The apparent power and strength, as held in the West, or the fortitude in suffering, of the East?

The West says, "We minimise evil by conquering it." India says, "We destroy evil by suffering, until evil is nothing to us, it becomes positive enjoyment." Well, both are great ideals. Who knows which will survive in the long run? Who knows which attitude will really most benefit humanity? Who knows which will disarm and conquer animality? Will it be suffering, or doing?

In the meantime, let us not try to destroy each other's ideals. We are both intent upon the same work, which is the annihilation of evil. You take up your method; let us take up our method. Let us not destroy the ideal. I do not say to the West, "Take up our method." Certainly not. The goal is the same, but the methods can never be the same. And so, after hearing about the ideals of India, I hope that you will say in the same breath to India, "We know, the goal, the ideal, is all right for us both. You follow your own ideal. You follow your method in your own way, and Godspeed to you!" My message in life is to ask the East and West not to quarrel over different ideals, but to show them that the goal is the same in both cases, however opposite it may appear. As we wend our way through this mazy vale of life, let us bid each other Godspeed.


THE RAMAYANA - Swami Vivekananda
(Delivered at the Shakespeare Club, Pasadena, California, January 31, 1900)