Friday, 1 August 2014

माया क्या है


            सारा संसार मृत्यु की ओर चला जा रहा है; सभी मरते हैं। हमारी प्रगति, हमारे व्यर्थ के आडम्बर-पूर्ण कार्य-कलाप, हमारे समाज-सुधार, हमारी विलासिता, हमारे ऐश्वर्य, हमारा ज्ञान-इन सबकी मृत्यु ही एकमात्र गति है। इससे अधिक निश्चित बात और कुछ नहीं। नगर पर नगर बनते हैं और नष्ट हो जाते हैं। साम्राज्य पर साम्राज्य उठते हैं और पतन के गर्त में समा जाते हैं, गृह आदि चूर-चूर होकर विभिन्न ग्रहों की वायु के झोकों से इधर-उधर बिखर जाते हैं। इसी प्रकार अनादि काल से चलरा रहा है। इस सबका आखिर लक्ष्य क्या है? मृत्यु! मृत्यु ही सबका लक्ष्य है। वह जीवन लक्ष्य है, सौन्दर्य का लक्ष्य है, ऐश्वर्य का लक्ष्य है, शक्ति का लक्ष्य है और तो और धर्म का भी लक्ष्य है। साधु और पापी दोनों मरते हैं, राजा और भिक्षुक दोनों मरते हैं-सभी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। फिर भी जीवन के प्रति यह प्रबल आसक्ति विद्यमान है। हम क्यों इस जीवन से आसक्त हैं? क्यों हम इसका परित्याग नहीं कर पाते? यह हम नहीं जानते। और यही माया है।

            माता बडे यत्न से सन्तान का लालन-पालन करती है। उसका सारा मन, प्राण सारा जीवन मानो उसी बच्चे में केन्द्रित रहता है। बालक बडा हुआ युवावस्था को प्राप्त हुआ और शायद दुश्चरित्र एवं पशुवत होकर प्रतिदिन अपनी माता को पीटने लगा, किन्तु माता फिर भी पुत्र से चिपकी रहती है। जब उसकी विचार शक्ति जाग्रत होती है तब वह उसे अपने स्नेह के आवरण में ढक लेती है, किन्तु वह नहीं जानती यह स्नेह नहीं है; एक अज्ञात शक्ति ने उसके स्नायुओं पर अधिकार कर रखा है। वह इसे दूर नहीं कर सकती। वह कितनी ही चेष्ट क्यों करे, इस बन्धन को तोड नहीं सकती, और यही माया है।

            हम सभी कल्पित सुवर्ण लोम (Golden Fleece) की खोज में दौडते रहते हैं। सभी सोचते हैं कि हमें वह मिलेगा; किन्तु उनमें से कितने मनुष्य इस संसार में जीवित हैं? प्रत्येक विचारशील व्यक्ति देखता है कि सुवर्ण लोम को प्राप्त करने की उसकी दो करोड में एक से अधिक सम्भावना नहीं है; तथापि प्रत्येक मनुष्य उसके लिए कठोर संघर्ष करता है। बस यही माया है।
(II,४७-४८)

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मुक्तसंग्ङोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।
सिद्ध‌‌यसिद्धयोर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥१८.२६॥

Freed from attachment, non-egoistic, endowed with courage and enthusiasm and unperturbed by success or failure, the worker is known as a pure (Sattvika) one. Four outstanding and essential qualities of a worker. - Bhagwad Gita : XVIII-26