Friday, 27 May 2016

Learning from 'The bowl of milk....'

Can we think of some more learning from it? Can it be applied to the society where we live in?

We come across so many misfits all around -  misfits in family, in monasteries, in various institutions, in society. We come across people who are unable to integrate themselves into the group they are supposed to be a part of. They are sugar all right, but something has gone wrong with that sugar. It has got covered with an impervious, insoluble layer of fear, suspicion, hatred, jealousy, unexamined biases and prejudices, distorted understanding of oneself, and so on by one or more or all of these. This is what makes integration difficult.

For integration to be possible, it naturally follows that the insoluble incrustation must be somehow got rid of. Examining oneself and one's life, one's priorities and one's needs, with a calm, peaceful, concentrated mind is usually sufficient to liberate the trapped sugar and hasten the dissolving process. In some cases, external help may be necessary. Parents and teachers can do a lot to help the growing child integrate well with its surroundings. People who remain alienated, unconnected, unintegrated as adults have usually been just that even as little children. The upbringing and training in one's childhood play a big part in the kind of life an adult lives.

How can I be sure I won't lose myself totally by getting dissolved in a group? Will there be any 'I' left or will it be subsumed totally by the 'we'? Do I have to lose my personal freedom in order to taste collective freedom? These questions naturally come up and must be answered" What we need to know, in effect, is whether we can be 'I' and 'we' at the same time.

Vedanta says yes, we can be both 'I' in my essential nature, 'we' in my apparent nature. Essentially, I am spirit eternal and free, birthless and deathless, blissful and perfect. I can remain that way, no matter what group I am a part of. Nothing can
take away or reduce or change my true nature, even though I may not have realized it fully yet.

Thursday, 26 May 2016

Learning from 'A bowl of milk...'

Is there any learning from 'A bowl of milk and a spoonful sugar'?

Following few points can be pondered over.

The first thing we learn is that everyone of us is sugar, and milk is the larger whole of which we are or want to be a part. Just as it is natural for sugar to dissolve in milk and become, so to speak, fully integrated into the milk-structure, it is natural for us to 'dissolve' into a group be it a family, community, nation, or the world as a whole and be fully integrated with it.

The second thing we learn is that by dissolving into a group, we don't lose our individuality. Sugar doesn't lose its nature when it dissolves in milk. It not only retains its sweetness, but also makes the milk sweet. Similarly, it is possible for us to dissolve in a group without losing our true nature. Not only do we not lose anything, we also make a positive contribution to the group by our dissolved presence.


The third thing we learn is that by dissolving, we open ourselves to other healthy, nourishing elements present in the solution. Thus we not only contribute to the group, but we also get a lot of things from the group. It's a two-way traffic.


The fourth thing , we have to learn is that in order to dissolve, we don't have to do anything special. We just have to be our true selves, nothing more, nothing less. Sugar needs to be just sugar in order to dissolve. So integration shouldn't be a problem if we are truly ourselves.


Can we think of some more learning from it? Can it be applied to the society where we live in?

Wednesday, 25 May 2016

देशभक्ति की तीन सीढ़ियां

मेरी क्रांतिकारी योजना (स्वामी विवेकानन्द का बहुचर्चित भाषण के अंश)
देशभक्ति की तीन सीढ़ियां

"लोग देशभक्ति की चर्चा करते हैं। मैं भी देशभक्ति में विश्वास करता हूं,
और देशभक्ति के सम्बन्ध में मेरा भी एक आदर्श है। बड़े काम करने के लिए तीन
बातों की आवश्यकता होती है। पहला है – हृदय की अनुभव शक्ति। बुद्धि या
विचारशक्ति में क्या है? वह तो कुछ दूर जाती है और बस वहीं रुक जाती है। पर
हृदय तो प्रेरणास्त्रोत है! प्रेम असंभव द्वारों को भी उद्घाटित कर देता
है। यह प्रेम ही जगत के सब रहस्यों का द्वार है। अतएव, ऐ मेरे भावी
सुधारकों, मेरे भावी देशभक्तों, तुम अनुभव करो!

क्या तुम अनुभव करते हो कि देव और ऋषियों की करोड़ों संतानें आज पशु-तुल्य
हो गयीं हैं? क्या तुम हृदय से अनुभव करते हो कि लाखों आदमी आज भूखे मर रहे
हैं, और लाखों लोग शताब्दियों से इसी भांति भूखों मरते आए हैं? क्या तुम
अनुभव करते हो कि अज्ञान के काले बदल ने सारे भारत को ढंक लिया है? क्या
तुम यह सब सोचकर बेचैन हो जाते हो? क्या इस भावना ने तुमको निद्राहीन कर
दिया है? क्या यह भावना तुम्हारे रक्त के साथ मिलकर तुम्हारी धमनियों में
बहती है? क्या वह तुम्हारे ह्रदय के स्पंदन से मिल गयी है? क्या उसने
तुम्हें पागल-सा बना दिया है? क्या देश की दुर्दशा की चिंता ही तुम्हारे
ध्यान का एकमात्र विषय बन बैठी है? और क्या इस चिंता में विभोर हो जाने से
तुम अपने नाम-यश, पुत्र-कलत्र, धन-संपत्ति, यहाँ तक कि अपने शरीर की भी सुध
बिसर गए हो? तो जानो, कि तुमने देशभक्त होने की पहली सीढ़ी पर पैर रखा है-
हां, केवल पहली ही सीढ़ी पर!

अच्छा, माना कि तुम अनुभव करते हो; पर पूछता हूं, क्या केवल व्यर्थ की
बातों में शक्तिक्षय न करके इस दुर्दशा का निवारण करने के लिए तुमने कोई
यथार्थ कर्त्तव्य-पथ निश्चित किया है? क्या लोगों की भर्त्सना न कर उनकी
सहायता का कोई उपाय सोचा है? क्या स्वदेशवासियों को उनकी इस जीवन्मृत
अवस्था से बाहर निकालने के लिए कोई मार्ग ठीक किया है? क्या उनके दुखों को
कम करने के लिए दो सांत्वनादायक शब्दों को खोजा है? यही दूसरी बात है।
किन्तु इतने से ही पूरा न होगा!

क्या तुम पर्वताकार विघ्न-बाधाओं को लांघकर कार्य करने के लिए तैयार हो?
यदि सारी दुनिया हाथ में नंगी तलवार लेकर तुम्हारे विरोध में खड़ी हो जाए,
तो भी क्या तुम जिसे सत्य समझते हो उसे पूरा करने का साहस करोगे? यदि
तुम्हारे सगे-सम्बन्धी तुम्हारे विरोधी हो जाएं, भाग्यलक्ष्मी तुमसे रूठकर
चली जाए, नाम-कीर्ति भी तुम्हारा साथ छोड़ दे, तो भी क्या तुम उस सत्य में
संलग्न रहोगे? फिर भी क्या तुम उसके पीछे लगे रहकर अपने लक्ष्य की ओर सतत
बढ़ते रहोगे? क्या तुममे ऐसी दृढ़ता है? बस यही तीसरी बात है।

यदि तुममे ये तीन बातें हैं, तो तुममे से प्रत्येक अद्भुत कार्य कर सकता
है। तब तुम्हें समाचारपत्रों में छपवाने की अथवा व्याख्यान देते फिरने की
आवश्यकता न होगी। स्वयं तुम्हारा मुख ही दीप्त हो उठेगा! फिर तुम चाहे
पर्वत की कन्दरा में रहो, तो भी तुम्हारे विचार चट्टानों को भेदकर बाहर
निकल आयेंगे और सैकड़ों वर्ष तक सारे संसार में प्रतिध्वनित होते रहेंगे। और
हो सकता है तब तक ऐसे ही रहें, जब तक उन्हें किसी मस्तिष्क का आधार न मिल
जाए, और वे उसी के माध्यम से क्रियाशील हो उठें। विचार, निष्कपटता और
पवित्र उद्देश्य में ऐसी ही ज़बर्दस्त शक्ति है।
09 फरवरी, 1897
विक्टोरिया पब्लिक हॉल (मद्रास)