Monday, 8 February 2016

India's Mission

'What is it that India has to give to the world, or contribute to the harmony of civilizations?' India's mission is spiritualization of humanity.

 

Swami Vivekananda said,

"This is the theme of Indian life - work, the burden of her eternal songs, the backbone of her existence, the foundation of her being, the raison d'être of her very existence — the spiritualization of the human race. In this her life-course she has never deviated, whether the Tartar ruled or the Turk, whether the Mogul ruled or the English." (CWSV, vol. IV, p. 315.)

 

Swami Vivekananda warned us,

"We must not forget that what I mean …by spiritual thought is the sending out of life - giving principles, not the hundreds of superstitions that we have been hugging to our breasts for centuries. These have to be weeded out even on this soil, and thrown aside, so that they may die for ever." (CWSV, vol. III, pp. 277- 278.)


How will this spiritualization of humanity take place? What are those life-giving principles?




Sunday, 7 February 2016

अार्दश कार्यकार्ता

यह कहने से काम नहीं चलेगा कि मेरे पास समय नहीं है। यदि हम इसकी आवश्यकता को समझकर ठीक प्रकार से प्रयत्न करेंगे, तो पर्याप्त समय निकल सकेगा। अपने चारों ओर इतना विशाल समाज फैला पड़ा है, जिसके बीच हमें प्रयत्न करना है। यदि हम कहें कि हमारे पास समय नहीं, तो यह हमारे लिये शोभा देने वाली बात नहीं। हममें से प्रत्येक, अपने दैनिक जीवन के विभिन्न व्यवहार करते समय समाज के साथ सम्पर्क स्थापित करता ही है। हमें इन सब व्यवहारों के बीच अपने कार्य का ध्यान बनाये रखना होगा।

प्रत्येक व्यक्ति की जो कुछ गुण-संपदा है, उसका भली प्रकार आकलन कर समाजहित में उसे प्रयुक्त करने की उसे प्रेरणा देनी चाहिए। व्यक्तियों के प्रत्यके व्यवहार में से कुछ न कुछ राष्ट्रहित का विचार निकालते बनना चाहिए। यहाँ तक कि जिन्हें अवगुण कहा जाता है, उनका भी राष्टहित में प्रयागे करने की कला मालूम होनी चाहिए।

जीवन में कभी कुछ माँगना नहीं। देशभक्ति का व्यापार क्या करना? समष्टिरूप परमात्मा को राष्ट्र के रूप में सेवा के लिये सामने व्यक्त देखकर, अपनी सम्पूर्ण शक्ति और बुद्धि उसके चरणों में अर्पण कर उसकी कृपा के ऊपर अपना जीवन चलाना है।

कृत्रिम अनुशासन, रूखी-सूखी पेड़ की टहनी के समान निष्प्राण और टूटनेवाला होता है। जीवमान, चैतन्यमय व्यक्ति की स्वेच्छा से स्वीकृत और समष्टि रूप अहंकार से ही ओतप्रोत जो अनुशासन है, वही संगठित रूप से खड़ा रह सकता है। वही चिरंजीव होता है। जो अमृत-रस से भरा है, उसे मारने की जगत् में किसी की शक्ति नहीं। वह अपने बोझ से भी कभी नहीं टूटता।

व्यक्ति-स्वातन्त्र्य का अर्थ मनमौजी होना कदापि नहीं। जो सबको मान्य हो और हितकारी हो उसी मर्यादा के अन्दर अपनी स्वतंत्रता का उपभोग प्रत्येक को करना होगा। स्वेच्छाचारिता के ढंग से चाहे जैसा उपभोग करते रहने की अनुमति उसे नहीं दी जा सकती।

--

The main theme of my life is to take the message of Sanatana Dharma to every home and pave the way for launching, in a big way, the man-making programme preached and envisaged by great seers like Swami Vivekananda. - Mananeeya Eknathji

विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी (Vivekananda Kendra Kanyakumari)
Vivekananda Rock Memorial & Vivekananda Kendra : http://www.vivekanandakendra.org
Read Article, Magazine, Book @ http://eshop.vivekanandakendra.org/e-granthalaya
Cell : +91-941-801-5995, Landline : +91-177-283-5995

. . . Are you Strong? Do you feel Strength? — for I know it is Truth alone that gives Strength. Strength is the medicine for the world's disease . . .
This is the great fact: "Strength is LIFE; Weakness is Death."
Follow us on   blog   twitter   youtube   facebook   g+   delicious   rss   Donate Online

Saturday, 6 February 2016

अार्दश कार्यकार्ता

अपना धर्म, जिसमें अभ्युदय और निःश्रेयस् दोनों निहित हैं, हमारी आँखों के सामने दिशा-दिग्दर्शन करनेवाले ध्रुव तारे के समान सदैव रहे तथा उसके अधिष्ठान पर राष्ट्र का पुनरुज्जीवन किया जाए। इसलिये व्यावहारिक दैनिक जीवन में उनके उपदेशों का अनुसरण करें, अपने को व्यक्तिश और सामाजिक दृष्टि से बलशाली बनायें, अपने सामूहिक जीवन में पावित्र्य लाएं, अपने हृदय में यह भाव जागृत करें कि हमें इस विश्व में एक जीवनोद्देश्य पूर्ण करना है। पूर्ण विश्वास रखें कि हम अमर जाति हैं। यदि हम एकात्मता की भावना से धर्म, जीवन की विषुद्धता और अंतिम सत्य की अनुभूति के आधार पर समाज को शक्तिशाली, निर्भय और संगठित करते हैं, तो पुनश्च विश्वगरुु का पद प्राप्त कर सकते हैं।

सामान्यतः मनुष्य जगत् के आकर्षणों से विचलित होता ही है। यदि किसी को राजनीति के क्षेत्र में जाने का अवसर मिल गया, तो वह सोचने लगता है कि वह भगवान् के समकक्ष हो गया है। अब उसके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रहा। भगवान् ने गीता में कहा है - 'मेरे लिये कोई कर्तव्य नहीं। कर्म के लिये मेरे मन में कोई स्पृहा भी नहीं।' इसी प्रकार राजनीति के क्षेत्र में गया हुआ व्यक्ति भी अपने को भगवान् मान कर कहता है कि मेरे लिये अब कोई कर्म नहीं। राजनीतिक क्षेत्र में भाषणबाजी करना ही मेरे लिये सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रकार्य है, बाकी सब नगण्य व क्षुद्र हैं। राजनीतिज्ञों में ऐसा अभिमान उत्पन्न् हो जाता है।

यदि अपने मन में यह दृढ़ धारणा हो कि यह राष्ट्र अपना है और यहाँ अपना राष्ट्र-जीवन है, यह राष्ट्र-जीवन श्रेष्ठ और उन्नत बने, इसका दायित्व अपने ऊपर ही है, तो यह समझना कठिन नहीं होगा कि वह दायित्व पूर्ण करने के लिये केवल वर्तमान बातों की ओर ध्यान न देते हुए चिरंतन रूप से प्रत्येक व्यक्ति के ह्दय कपस में राष्ट्र-भक्ति की भावना जागृत करने हेतु एक सुव्यवस्थित तथा, राष्ट्रीय भावना से प्रभावित ऐसा कार्य खड़ा करना पडे़गा।

यदि हमारे मन में विकार नहीं है, हमारी श्रध्दा का केन्द्र नहीं हिला है, तो हमारे मन में झंझावातों में उड़ने की प्रवृत्ति पैदा नहीं हो सकती। राष्ट्र का चैतन्य किसी न किसी रूप में प्रकट होगा ही। बीज बो दिया है, वट वृक्ष अवश्य ही खड़ा होगा। सम्पूर्ण भारत इसके नीचे आएगा। स्थान-स्थान पर नई जड़ जमेगी। इस निश्चय पर अडिग होकर चलेंगे तो संकट नहीं आ सकता। संकट तो अधूरी शक्ति पर आता है, पूर्ण पर नहीं। एकात्मता के आधार पर पूर्ण नीतिमत्ता से समाज को प्रबल एकसूत्रता में संगठित किया तो उस पर कोई संकट नहीं आएगा, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र-जीवन उसकी प्रेरणा से चलेगा। सत्ताधीश कौन है, इसका सवाल नहीं। हम बढ़े हैं या नहीं, यह देखें।

जनसाधारण को शिक्षित करना तथा उनके द्वारा चुने गये योग्य व्यक्तियों को राष्ट्रहितकारी कार्याे में संलग्न बनाये रखने का अपना कार्य तभी संभव है और हम तब ही उसके पात्र बन सकते हैं, जब हमारा समाज के साथ आत्मीयतापूर्ण निकट का सम्बन्ध हो।

--

The main theme of my life is to take the message of Sanatana Dharma to every home and pave the way for launching, in a big way, the man-making programme preached and envisaged by great seers like Swami Vivekananda. - Mananeeya Eknathji