Thursday, 11 January 2018

{Daily Katha:1427} निवेदिता - एक समर्पित जीवन - 13


यतो धर्म: ततो जय:
भारतीयता से प्रेम
        निवेदिता को पहले आशा थी कि भारत और इंग्लैण्ड अवश्य ही एक दिन मित्र बनेंगे, पर उसके सामने कुछ ऐसी घटनाएं घटित हुई थीं जिससे उनका भ्रम टूट गया था| अमेरिका में भी उन्हें जो अनुभव मिले वे भी मन को धक्का पहुँचाने वाले थे| ईसाई मिशनरियों ने भारत का किंतना विकृत रूप पश्चिमी समाज के समक्ष प्रस्तुत किया था ? भारत परतन्त्र था इसीलिए ईसाई मिशनरियों ने इतनी हिम्मत की थी| एक दिन भारतीय नेता विपिन चन्द्र पाल जब अमेरिका में भाषण दे रहे थे, तब श्रोताओं ने उनसे कहा था - 'पहले अपने देश को स्वतन्त्र करो, फिर यहाँ आओ और अपने देश के धर्म और दर्शनशास्त्र के बारे में हमें बताओ| हम तभी तुम्हारी सुनेंगे|'

        निवेदिता को भी इस तरह जे कटाक्ष, कटु बातें सुनने को मिलीं| अमेरिका में स्वामीजी को कितना अपमान सहन करना पड़ा था | उनके महान कार्य को नष्ट करने के लिए वहाँ के विरोधी लोगों ने एकजुट होकर स्वामीजी के ऊपर कितने ही बार कठोर हमले किए थे|

       पेरिस में डॉ. जादीशचन्द्र बसु का कितना सम्मान हुआ था, निवेदिता इसकी साक्षी थी; किन्तु ठीक इसके विपरीत इंग्लैण्ड में उनके साथ किए गए अपमानजनक व्यवहार से निवेदिता व्यथित हुई थीं| इंग्लैण्ड के सभी ब्रिटिश वैज्ञानिक इस एकाकी भारतीय वैज्ञानिक को मानसिक रूप से तोड़ने के लिए, उनका अपमान करने के लिए संगठित हो गए थे| इस सम्बन्ध में जब निवेदिता को विस्तृत विवरण का पता चला तब वह बहुत क्रोधित हुई और इंग्लैण्ड को इसके लिए धिक्कारा| इस बारे में उन्होंने लिखा था - 'बोस युद्ध' का कारण लेकर इंग्लैण्ड ने जो हीन भावना दर्शायी है, इससे इस देश की व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक दुर्गति का पता चलता है|
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