Thursday, 25 January 2018

निवेदिता - एक समर्पित जीवन - 16


  स्वामी जी का अन्त समय

यतो धर्म: ततो जय:

जून 21 को निवेदिता स्वामीजी से मिलने मठ गयीं। तब स्वामीजी ने कहा था -एक उग्र ध्यानावस्था मेरे ऊपर हावी होती जा रही है। मैं मानसिक रूप से मृत्यु का स्वागत करने के लिए पूर्ण रूप से तैयार हूँ। दो जुलाई,1902 बुधवार को निवेदिता पुनः मठ गयीं। एकादशी का दिन था। स्वामीजी ने खुद तो उपवास रखा हुआ था पर उन्होंने निवेदिता को अपने हाथों खाना परोसने का हठ किया और आग्रहपूर्वक खाना खिलाया। खाना समाप्त होने के पश्चात स्वामीजी ने निवेदिता के हाथों पर पानी डालकर हाथ धुलवाये तथा गमछे से उनके हाथ पोंछे। स्वाभाविक ही निवेदिता ने इस सब बातों का विरोध किया,पर स्वामीजी ने उसकी एक न सुनी। ये सब बातें तो मुझे आपके लिए करनी चाहिए स्वामीजी, आपको मेरे लिए नहीं -निवेदिता ने कहा।

तब स्वामीजी ने गम्भीरता से उतर दिया - ईसा मसीह ने अपने शिष्यों के पैर धोये थे। पर अपने जीवन के अन्तिम समय में........... ये शब्द निवेदिता को होठों तक आये, पर उन्होंने इन शब्दों का उच्चारण नहीं किया। यह अच्छा ही हुआ कि ये शब्द उच्चारित नहीं हुए, क्योंकि यहाँ भी अन्तिम समय आ चुका था।

शुक्रवार 4 जुलाई को स्वामी विवेकनन्द रोज से अधिक तन्तुरुस्त लगे। पिछले सालों से अधिक स्वस्थ वे उस दिन नजर आ रहे थे। दोपहर तक वे मन्दिर में थे। नित्यानुसार तीन घण्टे तक उन्होंने छात्रों को संस्कृत पढ़ायी। जो कोई भी उनसे मिला सबसे बात की। शाम को घूमने गए।

वहाँ पहुँचने पर  निवेदिता को पता चला कि पिछली सन्ध्या की आरती होने के बाद स्वामीजी ध्यानमग्न हो गए। करीब एक घण्टे बाद वे चैतन्य हुए और फिर फर्श पर बिछे उनके बिस्तर पर लेट गए। तथा अपने एक शिष्य को उन्होंने पंखा झलने को कहा। ऐसे ही एक  और घण्टा बीत गया। फिर उनका हाथ थोड़ा सा हिला, फिर दो बार दीर्घ श्वसन सुनाई दिया और फिर सब शान्त हो गया।


To be Continued


 
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हमें कर्म की प्रतिष्ठा बढ़ानी होंगी। कर्म देवो भव: यह आज हमारा जीवन-सूत्र बनना चाहिए। - भगिनी निवेदिता {पथ और पाथेय : पृ. क्र.१९ }
Sister Nivedita 150th Birth Anniversary : http://www.sisternivedita.org
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