Thursday, 7 December 2017

निवेदिता - एक समर्पित जीवन - 5

यतो धर्म: ततो जय:

 गौरवपूर्ण संस्कृति

अमरनाथ की यात्रा से लौटने के पश्चात उनके बंगला भाषा के शिक्षक व ज्येष्ठ गुरु-भ्राता स्वामी सवरुपानन्दजी को एक अौर कार्य मिल गया - भगिनी को हिन्दु धर्म की शिक्षा देना। भगिनी के प्रति उनका सहज स्नेह अौर उनके पाण्डित्य को देखकर ही स्वामी जी ने उन्हें यह दायित्व सौंपा ।

एक दिन भगिनी ने स्वरुपानन्द जी के सामने अपनी जिज्ञासा व्यक्त की - "महाराज, मुझे वेद पढाइए।"

सुनते ही खिलखिलाकर हँस पडे स्वामी स्वरुपानन्दजी अौर बोले - "वाह! ठीक ही तो कहती, किसी को अगर चलना सीखना हो तो उसे चाहिये कि वह हिमालय की यात्रा करे, चलना भी सीख जाएगा अौर हिमालय-विजयका गौरव भी अनायस ही मिल जाएगा, क्यों?"

किंचित अप्रतिभ होती हुई भगिनी ने कहा - "नहीं, नहीं महारज, मैंने सुना है कि हिन्दू धर्म के मर्म को जानने के लिये वेद ही सर्वश्रेष्ठ सोपान हैं, अतः .................।"

बिच में ही बात काटकर वे बोले - "धर्म किसे कहते हैं, जानती हो ?"

भगिनी उत्साह में भरकर बोलने लगी - "मैं इग्लैंण्ड में थी, तभी स्वामीजी से इसके बारे में कुछ ..................... ।"

"रुको - रुको, इतनी उतावल मत करो, इग्लैंण्ड में स्वामीजी से जो भी सुना, कु नोबल ने सुना। मैं जानना चाहता हूँ कि निवेदिता धर्म के बारे में क्या अनुभव करती है?"

भगिनी चकित होकर स्वामीजी को निहारने लगी, पूछा - "अाखिर अाप कहना क्या चाहते हैं महाराज, मृदु कंठ से स्वरुपानन्द बोले  - क्या तुम जानती हो कि प्रातः काल शैय्या त्याग कर भूमि पर पाँव रखते समय हिन्दुअों के मन में क्या भाव होते हैं, देखो, मैं तुम्हें एक श्लोक सुनाता हूँ - "

समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले ।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे ।।

अर्थात् - हे पालनकर्ता की सहयोगिनी देवी, तुम्हारे ऊपर पाँव रखने के लिये मुझे क्षमा करो ।


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