Wednesday, 29 November 2017

निवेदिता - एक समर्पित जीवन - 4

यतो धर्म: ततो जय:

 मार्गरेट से  निवेदिता

25 मार्च 1898 मार्गरेट नोबल के जीवन का  अत्यंत महत्वपूर्ण दिन।

आज पूज्य स्वामी जी उन्हें दीक्षा देंगे। एक नवीन व्रत में विकसित होकर उनके आदर्श अनुसार ही जीवन को संचालित करने की इच्छा स्वाभाविक रूप से अंतर में उठने लगी। दीक्षा के समय उन्होंने स्वामी जी का एक दूसरा ही रूप देखा। नेत्रों में अपार करुणा लिए, भावविभोर गुरुदेव अपने "परमधन" को प्रदान करने हेतु प्रस्तुत थे।

वातावरण की पवित्रता भगिनी की उत्सुकता के साथ मिलकर ह्रदय को प्रकम्पित कर रही थी।

गंभीर कंठ से उन्होंने शिव उपासना का मंत्र प्रदान किया तत्पश्चात ब्रम्हचर्य पालन के लिए अभिमंत्रित किया और भक्ति पूर्वक भगवान बुद्ध के चरणों में पुष्प अर्पित करने का मृत्यु आदेश दिया। अंत में उन्होंने कहा - "जाओ और उनका अनुसरण करो जिन्होंने लेकर दूसरों के कल्याण के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया। आज मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल के स्वामी जी ने एक नया नाम दिया "निवेदिता" अर्थार्थ "समर्पिता"।

नूतन नाम के अर्थ को जानकर उन्हें बहुत आनंद मिला।

वे मुग्ध भाव से स्वामी जी की और देख रही थीं। भाव विभोर स्वामी जी 1 घंटे तक अपने प्रिय भजन गाते रहे। भक्त कवियों के इन भजनों में भारतीय संस्कृति की उदात्त भावनाएं प्रकट हो रही थी। आज उन्होंने दीक्षा के रहस्य को समझा। और अपने ज्ञान और प्रेम का सर्वस्व दान करने को उद्यत गुरु और सर्वतोभावेन समर्पित शिष्य के आध्यात्मिक संबंध को उन्होंने अपने ह्रदय की गहराई में अनुभव किया और भारत की सेवा में समर्पण का संकल्प दोहराया।

{ निवेदिता एक समर्पित जीवन : पृष्ठ क्रमांक 28 }
To be Continue