Wednesday, 22 November 2017

निवेदिता - एक समर्पित जीवन - 3

यतो धर्म: ततो जय:

दृढ़ संकल्प

 स्वतंत्रता आंदोलन के समय 'वन्देमातरम' गीत स्वतंत्रता सेनानियों को अत्यंत प्रिय था और वह प्रखर राष्ट्रवादी भगिनी निवेदिता के बालिका विद्यालय की नित्य प्रार्थना का अंग बन गया था।

  इसकी लोकप्रियता को देख कर अंग्रेज सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया परंतु भगिनी ने अपने विद्यालय मैं इसे कभी बंद नहीं किया।

देव भूमि भारत

  भगिनी निवेदिता अत्यंत श्रद्धा और विश्वास के साथ बद्रीनाथ-केदारनाथ की तीर्थ यात्रा करने निकली थी।
 
  केदारनाथ के दर्शन के पश्चात वह बद्रीनाथ की ओर रवाना हुई। सारी यात्रा पैदल ही करनी थी। मार्ग दुर्गम था, मार्ग में उन्हें दर्शन करके लौटती हुई दो वृद्ध महिलाएं मिली। कमर झुकी थी, परंतु श्रद्धा उन्हें धकेले जा रही थी।

 अचानक उनमें से एक का पैर फिसल गया। सामने हजारों फीट गहरी खाई थी। बचना असंभव था। भगिनी के मुख से चीक निकल गयी।

  उन्होंने जब दूसरी महिला को जाकर अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए सांत्वना प्रदान की तो संतोष कि  सांस लेते हुए बुढ़िया बोल उठी - '.... क्या करें! यह सब भगवान की माया है। उनके दर्शन मिल गए। ....  और चाहिए भी क्या? भगवान के पास पहुंच गई है वह .....।' स्तंभित निवेदिता को लगा की वह वृद्धा नहीं, उसके मुख से भारत की आत्मा बोल रही थी, एक अनपढ़ ग्रामीण वृद्धा के इस  अध्यात्म भाव में स्वामी जी के शब्द उनके कानों में गूंज उठे - '.... भारत! वह देव दुर्लभ भूमि है। देवतागण भी इसमें जन्म लेने के लिए तरसते हैं। इसका अज्ञानी अनपढ़ किसान भी  अध्यात्मवाद की खान है ....।' आत्मविभोर निवेदिता के मुख से निकल पड़ा .... 'देवाधिदेव तुम्हारी जय हो।'

{ निवेदिता एक समर्पित जीवन : पृष्ठ क्रमांक 27 }