Saturday, 18 November 2017

निवेदिता - एक समर्पित जीवन - 2

यतो धर्म: ततो जय:

सच्ची श्रद्धा

एक बार कोलकाता स्कूल ऑफ आर्ट के प्रधान ई. बी. हेवेल से भगिनी निवेदिता की वार्ता हो रही थी।

श्री हेवेल ने कला संबंधी अपने अनुभव बताते हुए कहा, "....मैं एक व्यक्ति को चित्र खींचना तथा चित्रकारी करना सिखा सकता हूं परंतु मैं उसे कलाकार नहीं बना सकता हूं। क्योंकि कलाकार अंतर्मन की साधना से बनता है। चित्रकार चित्र में आंसू बहाती स्त्री को तो बना सकता है, किंतु उसमें स्त्री के मन की पीड़ा और दर्द को व्यक्त नहीं कर सकता। एक सफल कलाकार जो अंतर्मन में उस दर्द को आत्मसात किए हो वही उसे प्रभावपूर्वक चित्र में प्रस्तुत कर सकता है।"

भगिनी निवेदिता तुरंत बोली, "ठीक इसी प्रकार  देश के लिए, समाज के लिए प्रेम, जन्म के लिए स्वाभिमान, भविष्य के लिए आशा तथा भारत के लिए अगाध श्रद्धा आश्चर्यकारी कार्य करवा सकती है। आवश्यकता है भीतर से आस्था की।" 

{ निवेदिता एक समर्पित जीवन : पृष्ठ क्रमांक 26 }