Thursday, 30 November 2017

विवेकानन्द कन्या भगिनी निवेदिता - 1

यतो धर्म: ततो जय:

स्वामीजी को सहायता का वचन तो दिया परन्तु काम किस प्रकार से करना है यह तो मालूम नहीं है यह सोचकर उसने स्वामीजी को एक पत्र लिखा । भविष्य में जब कमी स्वामीजी मिलेंगे तब इसकी विस्तृत चर्चा हो पायेगी ऐसा वह सोच ही रही थी कि स्वामीजी का पत्र ही उसे प्राप्त हुआ।

प्रिय कुमारी नोबल

मेरे जीवन का उद्देश्य, मैं आपकी संक्षेप में लिख रहा दूँ- हरेक मानव को स्वयं के दिव्यल्व की अनुभूति कराना तथा जीवन के हर क्षण में उसे किसे तरह प्रकट करना यह सीखना । संम्पूर्ण जगत विम्रान्तियों को श्रृंखला से जकडा हुआ है । जो पत्दलित हैं उन पर मुझे दया आती है भले वह खी हो या पुरुष । पर उससे अधिक उन पर दया आती है जो उन पर अत्याचार करते हैं। एक बात मुझे सूर्य प्रकाश इतनी स्पष्ट दिख रही है कि अज्ञान ही सब दुखों को जड है । अन्य कोई नहीं । अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर कर प्रकाश देने वात्ना जैन आयेगा । त्याग से ही अमृत प्राप्त होता है ऐसा हमारा भूतकाल बताता है ऊन अर्णब्वत पास्ता तक के भविष्य- को त्याग से ही अमृत को प्राप्ति होगी । इस पृथ्वी पर जो सर्वोतम हैं तथा धैर्यवान हैं उन्हींकौ ही अन्य लोगों के
लिये त्याग करना चाहिए । शाश्वत प्रेम तथा अपरम्पार करुणा से भरें सेकडों बुद्ध जनता को सुखी करने हेतु चाहिए ।

अनाज का धर्म, सत्य धर्मं की विडम्बना मात्र है । आज यदि किसी चीज को अत्याधिक आवश्यकता है तो वह है चारिव्य की । जिनका जीवन यज्ञाम्रिडित तथा उज्वल प्रेम से भरा हुआ है उठी की आवश्यकता आज पग - पग पर अनुभव होती है । उनका प्रत्येक प्रेममय शब्द बज की भाँति काम कोमा । आपमें पूरे विश्व को हिलने का सुम सामव्यं है । इसमें कोई अतिरंजिंतता नहीं है । आप जैसे ही अन्य लोग आगे आयेंगे । आज हमें धैयंधूर्ण शब्द एवं धैर्यपूर्ण कृति की आवश्यकता है । अाप जागो ! जागो !

जब विश्व दु८ख से पीडित है तो कया अमर सुख से सो सकेगी ? इसी तरह से हम दोनों बार- बार आह्नग्रन वरेंगे । कब तक, जब तक सब आराध्य जागृत नहीं होंगे तथा हरेक के अन्दर का ईंश्वरतल्व जादृग्रत नहीं होगा तब तक । इसके अतिरिक्त जीवन में करने जैसा अन्य कुल भी नहीं है । इससे श्रेष्ठतर और कुछ भी नहीं है । परब बाते अपने आप आ जायेंगी । उसके लिये मुझे कुल सोचने को अनावश्यकता नहीं है । योजना अपने आप विकसित होकर नियोजित कार्य अपने आप सेम्यन्न हो जाते हैं । मैं केवल आवाहन करता हूँ जागो !

जागो ! ! शुभाशीर्वाद आपकी निरन्तर प्राप्त होते रहें ।

विवेकानन्द

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