Wednesday, 8 March 2017

राष्ट्र व देश की अवधारणा

श्री लखेश्वर चन्द्रवंशी जी के सहयोग से ....

हमारे यहां कहा जाता है कि सृष्टि यह दैवीय शक्ति से संचालित है, संसार की रचना ईश्वर ने की है। इसलिए कहा जाता है कि "देव निर्मितं देशं"। जिस भूमि विशेष का निर्धारण एक विशिष्ट सीमा तक सीमित हो, उसे देश कहते हैं। देश का एक शासक होता है, जिसके मार्गदर्शन में देश की व्यवस्थाएं संचालित होती हैं। पहले उस शासक को राजा के रूप में सब जानते थे। युग बदला, और 'राजा' के स्थान पर प्रधानमंत्री अथवा प्रेसिडेंट रूपी शासक अस्तित्व में आया। हम कह सकते हैं कि 'देश' राजनीति के  आधार पर चलता है। 

वहीं राष्ट्र (Nation) की अवधारणा व्यापक है। राष्ट्र किसी सीमा में नहीं बंधता, क्योंकि राष्ट्र यह सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मनोभाव से परिपूर्ण होता है। इसलिए कहा जाता है- "ऋषि निर्मितं राष्ट्रं"। ऋषिगण अपने तप, ज्ञान, शील और चरित्र से एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को समाज में प्रतिष्ठित करते हैं। ऋषियों के संदेश को जीवन का अंग बनाकर जीनेवाले मनुष्यों के समूह से एक आदर्श समाज की रचना होती है। आदर्श समाज वह, जहां के मनुष्य समष्टि के हित के लिए स्वयं का त्याग करने को तत्पर रहता है। उस समाज की संस्कृति आध्यात्मिक मूल्यों पर आधारित होती है। समाज में परस्पर सहयोग की भावना होती है, आपस में कोई विद्वेष नहीं होता। ऐसे समाज जहां भी हो वह 'राष्ट्र' है।

आदर्श समाज रचना की संकल्पना भारत की देन है। ईश्वर की खोज और विश्व के कल्याण के लिए अनुसंधान करनेवाले ऋषि-मुनि हमारे यहां ही हुए, इसलिए हमारे भारतवर्ष को युगों से राष्ट्र की संज्ञा दी गई है। लेकिन आज भारत राष्ट्र में आदर्श समाज के बीच में बहुत सारे रोड़े हैं। सामाजिक विषमता, भेदभाव, आपसी विद्वेष और राजनीतिक स्वार्थ ने भारत के 'राष्ट्र गौरव' को चोट पहुंचाने का काम किया है। स्वार्थ इतना हावी है कि अपनी जाति, राजनीति और विद्वेष के चलते भारतीय जीवन मूल्यों को समाज जीवन से मिटाने का षड्यंत्र चल रहा है। भारत के इतिहास, संस्कृति और शिक्षा को लेकर आपस में कोई सहमति दिखाई नहीं देती।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संस्थापक और आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 'राष्ट्र' की संकल्पना को बहुत स्पष्टता से व्यक्त किया है। वे कहते हैं, "हम ऐसे लोगों के समूह को 'राष्ट्र' नहीं कह सकते जो भिन्न-भिन्न संस्कृतियों वाले, भिन्न-भिन्न विचारधाराओं वाले हों तथा जिनके इतिहास भिन्न हों, हिताहित कल्पनाएं परस्पर विरोधी हों, परस्पर शत्रुभाव मानते हों, जिनके आपसी सम्बन्ध भक्ष्य-भक्षक के रहे हों और जिनके रहने के मूल कारण भी एक से न हो।"  

संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी गोलवलकर के अनुसार, "राष्ट्र सांस्कृतिक ईकाई होती है। जब किसी जनसमूह की ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक परम्पराएं एक हों, तब तक वह 'राष्ट्र' कहलाता है।" वहीं अन्त्योदय के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा है, "जब एक मानव-समुदाय के समक्ष एक मिशन, विचार या आदर्श रहता है और वह समुदाय किसी भूमि विशेष को मातृभाव से देखता है तो वह 'राष्ट्र' कहलाता है।" दीनदयालजी ने यह भी कहा कि, "'राष्ट्र' एक स्थायी सत्य है। राष्ट्र की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए 'राज्य' पैदा होता है।

इस तरह सामान इतिहासबोध, समान सांस्कृतिक जीवन, सामान विचारधारा, परस्पर मैत्रीभाव और किसी उदात्त ध्येय के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देनेवाले लोगों का समूह जिस स्थान पर हो, जिस देश में हो वह 'राष्ट्र' ही कहलायेगा। वहीं स्वामी विवेकानन्दजी ने राष्ट्र के ध्येय के सम्बन्ध में कहा है, "प्रत्येक राष्ट्र का लक्ष्य विधाता द्वारा निर्धारित है। प्रत्येक राष्ट्र के पास संसार को देने के लिए कोई न कोई संदेश है। प्रत्येक राष्ट्र को किसी विशेष संकल्प की पूर्ति करनी है।" स्वामीजी ने आगे कहा, "व्यक्ति को मुक्तिमार्ग पर बढ़ने के लिए पूर्ण आध्यात्मिक स्वतंत्रता, यही है हमारा राष्ट्रीय उद्देश्य। तुम चाहे वैदिक, जैन या बौद्ध, चाहे अद्वैत, विशिष्टाद्वैत अथवा द्वैत, किसी भी 'मत' को टटोल लो, ये सभी इस उद्देश्य पर एक हैं।" स्वामीजी ने कहा है, "हमारा 'धर्म' ही हमारे तेज, हमारे बल, इतना ही नहीं तो हमारे राष्ट्रीय जीवन का भी मूलाधार है।" स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, धर्म ही भारत का प्राण है, हमें इसे ही पुष्ट करना होगा। इस दृष्टि से कहा जाए तो धर्म ही "राष्ट्र" का प्राण होता है।