Sunday, 5 June 2016

चिति का चैतन्य

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद


चिति का चैतन्य एवं विराट की शक्ति

चिति द्वारा जो राष्ट्रीयता का साक्षात्कार होता है, पाश्चात्य प्रभावित नेतृत्व ने अपने आपको उसे चिति से काट लिया था। परिणामतः वे मजहबी पृथकतावाद का सामना न कर सके तथा राजनैतिक सम्प्रभुता एवं सांस्कृतिक एकात्मता का समन्वय नहीं कर सके। इसी कारण हमें विभाजन की त्रासदी झेलनी पड़ी तथा इसी कारण आज हमें कश्मीर समस्या एवं मजहबी आतंकवाद को झेलना पड़ रहा है।

 

जब कोई प्रजागृत चिति वाला समाज आत्म दर्शन करता है तो उसे विराट के दर्शन होते हैं। विराट समाज का शक्ति-भूत तत्त्व है। 'दैशिक शास्त्र' में लिखा है ''चिति से जागृत व एकीभूत हुई समष्टि की प्राकृतिक क्षात्रशक्ति विराट कही जाती है।'' भविष्य पुराण के अनुसार यह समाज एक ही पिता प्रजापति ब्रह्मा या विराट ने बनाया है।

''ऋगवेद में संपूर्ण मानवसमाज की एक विराट पुरूष के रूप में कल्पना की गई है जिसके सहस्रों सिर, सहस्रों आँखें, सहस्रों पैर हैं। यह विराट पुरूष संपूर्ण भूमि विस्तार से भी बढ़कर है। जैसे कि एकात्म मानव देह के मुख, बाहु, उदर और पैर, ये चार प्रमुख अवयव हैं, ..... उसी प्रकार मानवसमाजरूपी विराट पुरूष के भी समाज में ज्ञान-विज्ञान का विस्तार करने वाले ज्ञानवान पुरूष, दुर्जनों से समाज की रक्षा करने वाले शूरवीर पुरूष, समाज के भरण-पोषण की सामग्री का उत्पादन एवं विपणन करने वाले उद्यमी पुरूष और विभिन्न समाजोपयोगी कामों में लगे लोगों की सुविधाओं का ध्यान रखने वाले सेवापरायण पुरूष - ये चार प्रमुख अंग हैं:

सहस्रशीर्षा पुरूषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशांगुलम्।।

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः। ऊरू तदस्य यद्वैश्य पद्भ्यां शूद्रो अजायत।।

(ऋगवेद 10/90/1,12)

(विराट पुरूष के हजार सिर हैं, हजार आँखें हैं, हजार पैर हैं। संपूर्ण पृथ्वी को चारों ओर से व्याप्त कर वह पुरूष दशांगुल भाग पर स्थित हो गया। उसका मुख ब्राह्मण हुआ, भुजाएं क्षत्रिय हुईं, जंघा वैश्य और पैरों से शूद्र हुआ।)

 

विराटता का अनुभव समाज को अपनी अपरिमित शक्ति का साक्षात्कार करवाता है। जहां ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य एवं शूद्र पृथक-पृथक जातीय अस्मिताएं नहीं वरन् एक ही विराट पुरूष के अंगभूत हैं। समष्टिगत स्वस्थ संपूर्णता का नाम है विराट। विराट की इस प्राचीन भारतीय अवधारणा को अधुनातन संदर्भ देने का प्रयास करते हुए दीनदयाल उपाध्याय कहते हैं, ''जैसे राष्ट्र का अवलम्ब चिति होती है वैसे ही जिस शक्ति से राष्ट्र की धारणा होती है उसे 'विराट' कहते हैं। 'विराट' राष्ट्र की वह कर्मशक्ति है जो 'चिति' से जागृत और संगठित होती है। विराट का राष्ट्र जीवन में वही स्थान है जो शरीर में 'प्राण' का। प्राण से ही इंद्रियों को शक्ति मिलती है, बुद्धि को चैतन्य प्राप्त होता है और आत्मा शरीरस्थ रहती है।  राष्ट्र में भी विराट के सबल होने पर ही उसके भिन्न-भिन्न अवयव अर्थात् संस्थाएं सक्षम और समर्थ होती हैं। 'विराट' के आधार पर ही 'प्रजातंत्र' सफल होता है और बलशाली बनता है।''


- डा. महेश चंद्र शर्मा