Sunday, 22 May 2016

‘हिन्दू धर्म’ ही मानव धर्म और विश्व धर्म भाग ३


भाऊसाहब भुस्कुटे व्याख्यान माला में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का भाषण


इच्छा की पूर्ति करने का प्रयत्न सब करते हैं, करना भी चाहिए। हमारे यहां इसे कहा गया – "काम पुरुषार्थ"। इच्छाएं पूरी करनी है तो कमाई करनी होगी, अर्थार्जन करना होगा। यह हुआ -  "अर्थ पुरुषार्थ"। मनुष्य ही क्यों, प्राणी मात्र भी यह पुरुषार्थ करते ही हैं। आहार, निद्रा, भय, मैथुनंच, यह सबका लक्षण है। बिना किसी इंजीनियरिंग कॉलेज में गए बया पक्षी घोंसला बनाती है, मधुमक्खी छत्ता बनाती है। अंततः सब इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि इस चक्र से मुक्त हो जाओ अर्थात मोक्ष की इच्छा। इसे कहते हैं – "मोक्ष पुरुषार्थ"। किन्तु एक कष्ट है कि ये तीनों एक साथ नहीं मिलते। राजा मानसिंह को तन का सुख चाहिए था तो उसने अकबर की चाकरी स्वीकार की, प्रताप को मन का सुख भला लगा तो घांस की रोटी खाई। मुक्त होना है तो सुख छोड़ने पड़ेंगे। एक क्लर्क थे, परमानेंट हो चुके थे। सुबह ठीक 11 बजे ऑफिस जाना, कुर्सी पर बैठना और सोना, शाम ठीक 5 बजे उठकर घर जाना, उनका क्रम था। कोई काम-धंधा करना नहीं। एक बार किसी ने कहा, कुछ काम करिए जिससे प्रमोशन हो, रिटायरमेंट के बाद पेंशन ज्यादा मिलेगी, बुढ़ापे में चैन से सोना। इन्होंने कहा कि वह तो में आज भी कर रहा हूं। क्या जरूरत है फालतू झमेले की।

अगर किसी को कहा जाए कि रसगुल्ले खाओ तो वह 'हां' कहेगा। किंतु अगर कहा जाए हर रसगुल्ले के साथ सर पर एक जूता भी खाना पड़ेगा, तो कौन तैयार होगा? तन और मन दोनों का सुख चाहिए। कभी किसी ने सुना है कि किसी पशु ने आत्महत्या की? उसका तो एक ही लक्ष्य है - मरते दम तक जीना। केवल मनुष्य ऐसा प्राणी है जो सोचता है। मृत्यु के बाद क्या होगा, यह सोचता है। मैं प्रश्न पूछता हूं, शंका करता हूं, इसलिए मैं हूं। इसलिए मनुष्य मुक्ति का, मोक्ष का विचार करता है। इस सतत खोज के परिणामस्वरूप यहां धर्म का जन्म हुआ। हाड़-मांस के हम, उपभोग की शक्ति सम्पन्नता इसे छान्दोग्य उपनिषद् में आसुरी वृत्ति बताया गया।

अर्थ, काम, मोक्ष तीनों की साधना करनेवाले तुम अमरत्व के पुत्र हो, कभी नहीं मरते। उस शाश्वत सत्य को जान लेनेवाले शाश्वत सुख पाते हैं। अमर शाश्वत आत्मा ही विश्वात्मा परमात्मा है। उस एक से सब निकले हैं। अतः उस एक को जानो। उस एक को नहीं जानोगे तो सबको सुख कैसे मिलेगा। फिर तो बलशाली सुखी और निर्बल सदा दुखी रहेगा। जहां लड़ाई-झगड़ा होता रहेगा, वहां कोई सुखी नहीं रह सकता। युद्ध में क्या सैनिक ही मरते हैं? प्रजा भी शिकार बनती है। हारनेवाला तो हारता ही है, जीतनेवाले की भी हालत खराब हो जाती है। ब्रिटेन के विषय में कहा जाता था, कि उसके साम्राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता। किन्तु द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद इंग्लेंड इतना कमजोर हो गया कि उसके सारे उपनिवेश एक-एक कर स्वतंत्र हो गए। इतना ही नहीं तो आज वह स्वयं अमेरिका की दया पर आश्रित है।