Friday, 8 January 2016

Vayam suputra amrutasya noonam...

Samartha Bharat Parva Pranams!


'वयं सुपुत्रा अमृतस्य नूनं' का सन्देश लेकर जाएं : मा. बालकृष्णनजी

आप सभी को यहां (कन्याकुमारी) में देखकर बहुत आनंद हो रहा है। सेवा का भाव इस छोटी आयु में आना बड़े भाग्य की बात है। आप लोगों ने पूर्व जन्म में अवश्य ही कई पुण्य कर्म किए होंगे जिसकी वजह से इस जन्म में आपके मन में सेवा का भाव प्रगट हुआ है। हमारे देश की विशेषता भी देखिए जहां 60 प्रतिशत से अधिक लोग युवा हैं। अपनेआप में यह बहुत बड़ी बात है कि विश्व का प्राचीनतम देश भारत आज भी जवान है। 

हमें यह स्मरण में रखना चाहिए कि विदेशी आक्रमणों के बावजूद भारत आज भी स्वाभिमान से खड़ा है। अंग्रेजों ने हमपर खूब अत्याचार किए यहां तक कि देश के नमक पर भी कर लगाया और अंग्रेजों द्वारा बनाए गए नमक को खरीदने के लिए उन्होंने भारतवासियों को बाध्य किया। इसके विरोध में गांधीजी ने नमक सत्याग्रह किया। गांधीजी ने अपने इस सत्याग्रह के क्षण को अवसर में बदला। उन्होंने देशवासियों को संगठित करने का बीड़ा उठाया। हमारे सामने भी अवसर है जहां देश को सामर्थ्यशाली बनाने की चुनौती है। अवसर कभी किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। मिले हुए अवसर को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। हम भारत को कैसे समर्थ बनाएंगे, अपने जीवन को हम कैसे सार्थक बनाएंगे? इसबात पर सभी को विचार करना होगा। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता की ऊँचाइयों को पार करना होगा, चाहे वह कृषि क्षेत्र हो या शिक्षा का क्षेत्र, चाहे वह विज्ञान हो या पर्यावरण का। हमें प्रत्येक दिशा में सफलता प्राप्त करनी होगी।

सफल होने की हर किसी को इच्छा होती है। हर कोई 100 प्रतिशत सफल होना चाहता है। यह ठीक भी है। जीवन में पैसा कमाना जरुरी है, पर पैसा ही सबकुछ नहीं होता। सफलता मनुष्य जीवन का प्रथम अध्याय है और सार्थकता दूसरा अध्याय। आधा मार्ग सफलता है और आधा मार्ग सार्थकता का। इसलिए हमने समाज से जितना प्राप्त किया है, उससे अधिक लौटाना है। हम केन्द्र प्रार्थना में गाते हैं – "जीवने यावदादानं, स्यात प्रदानं ततोधिकम।" समाज रूपी ईश्वर ने मुझे दिया है, उसे वापस लौटाना है यह भाव चाहिए। ऐसा सोचते हुए इस बात का विचार होना चाहिए कि मैं भी ईश्वर का ही अंश हूं- वयं सुपुत्रा अमृतस्य नूनं।

हमें सफलता, सार्थकता के साथ ही सामर्थ्य की भी आवश्यकता है। जबतक हमारे हृदय में 'त्याग और सेवा' का भाव नहीं जगता तबतक हमारा जीवन सार्थक नहीं हो सकता। अधिकारियों (कार्यकर्ताओं) के मन में त्याग और सेवा का आदर्श होने ही चाहिए, तभी उनके आचरण के माध्यम से समाजजीवन में त्याग और सेवा का भाव जाग्रत होगा। त्याग और सेवा यानी मानवता। दूसरों के बारे में अच्छा विचार करने से हमारे दुर्गुण दूर हो जाते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने कहा है कि त्याग और सेवा ही हमारे राष्ट्रीय आदर्श हैं। हमें इस आदर्श के अनुरूप ही जीना है। भारत तभी जगतगुरु बनेगा जब सभी देशवासियों के मन में त्याग और सेवा की भावना जागेगी।

हम देखते हैं कि आईएसआईएस के लोग क्रूरतापूर्वक निर्दोष लोगों का खून बहा रहे हैं, हत्या कर रहे हैं। उन आतंकियों के अन्दर कोई हृदय नहीं है, उनके जीवन में कोई मूल्य नहीं है। क्या यह आतंकी संगठन विश्व का भला कर सकता है? बिल्कुल नहीं। विश्व को यदि कोई देश शांति का सन्देश दे सकता है तो वह केवल हमारा अपना देश भारत ही है। भारत का सन्देश है - योग। योग सभी को जोड़ता है। स्वामी विवेकानन्द ने यहां 25, 26 और 27 दिसम्बर, 1892 को राष्ट्र का ध्यान किया था। तब उन्होंने भारत के पतन का कारण ढूंढा और पाया कि आध्यात्मिक शक्ति के प्रगटन से ही भारत जाग्रत होगा। उन्होंने देशभर भ्रमण करते हुए संगठन का सन्देश दिया। राष्ट्र ध्यान के बाद संगठन की प्रेरणा देनेवाले स्वामीजी ने मनुष्य निर्माण और आध्यात्मिक जागरण के सन्देश पर बल दिया।  

भारत का विश्व को सन्देश है – "सर्वे भवन्तु सुखिनः" और "एकं सद विप्राः बहुधा वदन्ति"। हम मनुष्य का रंग-रूप, वेश-भूषा को नहीं देखते वरन हम मनुष्य में व्याप्त ईश्वरत्व को देखते हैं।

कन्याकुमारी से जाते समय हम एक सकारात्मक मंत्र लेकर जाएंगे- 'वयं सुपुत्रा अमृतस्य नूनं'। मैं हर कार्य में सफल हो सकता हूं क्योंकि मैं ईश्वर का अंश हूं। अपने भीतर विद्यमान शक्ति का उपयोग कीजिए। 'नहीं' कहने की बात न करें। 'आत्मविश्वास' नहीं है तो मनुष्य होने का क्या मतलब? स्वामीजी का अध्यययन करनेवाले असाधारण होते हैं। सेवा के यज्ञकुंड के लिए हम समिधा बनें, -चाहे हम सेवाव्रती, जीवनव्रती, वानप्रस्थी अथवा स्थानिक कार्यकर्ता हों। हमें स्मरण रखना होगा कि माननीय एकनाथजी का जीवन अतुल्य है। शिलास्मारक का निर्माण वेतन से नहीं, सेवाभाव से हुआ। एकनाथजी ने सभी को इस कार्य से जोड़ा। जो निःस्वार्थ भाव से कार्य करता है उसके भीतर शक्ति गंगाजल की तरह अवतरित व संचरित होती है।  जबतक विवेकानन्द शिलास्मारक रहेगा, एकनाथजी का नाम रहेगा।  एकनाथजी यह सब कर सके क्योंकि उनका जीवन 'वयं सुपुत्रा अमृतस्य नूनं' का प्रगटीकरण था। आइए, हम सब भी इसी मंत्र का प्रगटीकरण अपने जीवन में करें।