Monday, 11 January 2016

Ideal Social Order

Samartha Bharat Parva Pranams!

Tomorrow 12 Jan. Let us do Pushpanjali - offering flowers by all who would be participating in the program to Swami Vivekananda.

Swami Vivekananda placed before all of us the work that the Bharatmata is to do for the whole world, humanity and that is the work of Creating or Establishing Ideal Social Order. How such a society could be established? Mananeeya Nivedita Didi, the Vice-President of Vivekananda Kendra places before us the methodology that we are to follow :

शिव सुंदर नव समाज विश्ववंद्य हम गढ़ें : मा.निवेदिता दीदी

123 वर्ष पूर्व तीन दिन-तीन रात ध्यानस्थ रहकर स्वामी विवेकानन्दजी ने भारत के उत्थान पर गहन चिंतन किया था। देशवासियों के प्रति अगाध आत्मीयता रखनेवाले स्वामीजी ने देश के सामने त्याग और सेवा का महान आदर्श रखा। कोई भी सेवाकार्य हो उसके पीछे दो प्रकार की प्रेरणा कार्य करती है, - 1) आत्मीयता और 2) सजगता। आत्मीयता ऐसी कि यह मेरा देश है, यह मेरा समाज है, इसके उन्नयन में मेरा भी योगदान होना चाहिए। यह समाज मेरा ही अंग है। जब अंगूठे में दर्द होता है तो हम अंगूठे को काटकर नहीं फेंक देते, वरन उस दर्द को दूर करने का प्रयास करते हैं। अंगूठे का दर्द मेरा दर्द है। समाज की पीड़ा मेरी पीड़ा है, इसी भाव को आत्मीयता कहते हैं। हाल ही में चेन्नई में बाढ़ की आपदा में एक युवक ने लगभग 300 लोगों की जान बचाई थी। एक महिला जो दूध का व्यवसाय करती थीं, उसने यह सोचकर बाढ़ के दौरान घर-घर दूध पहुंचाया कि भूख से किसी बालक को परेशान न होना पड़े, भूख की वजह से किसी बालक की जान न जाए। यह संवेदन्शीलता ही है आत्मीयता। इसी तरह समाज की वस्तुस्थिति के प्रति भी हमें सजग रहना चाहिए। समाज के गरीब, अभावग्रस्त लोगों का ख़याल रखना, उनके उत्थान के लिए प्रयत्न करना, यह हमारे सजग होने का लक्षण है। सजगता में एक और महत्वपूर्ण आयाम है विपन्न (भ्रमित/भटके हुए) लोगों को सही राह दिखाना। 

सेवा के तीन प्रकार बताए गए हैं। महाभारत में भी इसका उल्लेख है।

1) रोटी, कपड़ा और घर जैसी प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना।

2) मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाना।

3) आत्मबोध के ज्ञान से मनुष्य के आत्मीयता का दायरा बढ़ाना।

अर्थात समाज के प्रति व्यक्ति की संवेदनशीलता को बढ़ाना। माननीय एकनाथजी ने इन तीन सेवाओं से आगे विचार रखते हुए एक चौथी प्रकार की सेवा का आदर्श हमारे सम्मुख रखा, - ऐसे समाज का निर्माण करना जहां आत्मीयता और सजगता के कारण सभी की आकांक्षाओं की पूर्ति हो और सेवा की आवश्यकता ही न रहे। ऐसे आदर्श समाज की रचना करना ही विवेकानन्द केन्द्र का कार्य है।

आजकल सेवा की अवधारणा ही बदल गई है। लोग अनाथालय, वृद्धाश्रम बनाने जैसे कार्य को ही सेवा कहने लगे हैं। केन्द्र की सेवा की अवधारणा यही है कि ऐसे आदर्श समाज की रचना करना जहां अनाथाश्रम अथवा वृद्धाश्रम की आवश्यकता ही न रहे। तात्पर्य है कि प्रत्येक घर में बड़ों का सम्मान हो और किसी को अनाथ न बनना पड़े। हमारे सामने गोस्वामी तुलसीदास के जीवन का उदाहरण है। उनका जन्म कहीं हुआ था, उनका पोषण, उनकी शिक्षा-दीक्षा किसी अन्य स्थान पर। समाज ने ही उनके पोषण व शिक्षा का दायित्व लिया था। असहाय, अभावग्रस्त तथा वंचितों के उत्थान को अपना दायित्व माननेवाला समाज हमें गढ़ना है। ऐसा समाज जो अपने सामाजिक कर्तव्य के प्रति आश्वस्त हो। विवेकानन्द केन्द्र की मूलभूत सेवा का आदर्श यही है। 

हम देखते हैं कि आईएसआईएस के आतंकी अपने जीवन को आतंकी गतिविधियों के लिए झोंक देते हैं। इस्लाम मतावलम्बी विश्व की परिकल्पना का स्वप्न लिए आतंकी अपने हिंसक गतिविधियों को अंजाम देते हैं। ईसाई मिशनरियों को भी लगता है कि सिर्फ बाइबल ही सही है। कम्युनिस्ट गरीबों के लिए कथित सहानुभूति और धनवान लोगों के लिए बैर का भाव रखते हैं। कम्युनिस्टों के आदर्श माओ की किताब अब चीन में नामशेष बनकर रह गई है। रद्दी बनकर रह गई है। कोई पाठक जब पुस्तक खरीदने जाता है तो चीन के पुस्तक विक्रेता कहते हैं कि माओ को पढ़ना है तो उन दुकानों में जाओ जहां रद्दी बिकती है अथवा पुरानी किताबें मिलती हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि माओ के विचारों को माननेवाले लोगों ने चीन और रूस में करोड़ों लोगों को कथित समानता की आड़ में मौत के घाट उतार दिया था। कम्युनिस्टों के जीवन का आधार भौतिकता है। कम्युनिस्टों ने मानवीय मन की स्वतंत्रता का हनन किया। दूसरी ओर पूंजीपतियों का आधार केवल पैसा कमाना है। चाहे वह जिस मार्ग से आए उन्हें तो बस, केवल धन चाहिए। इसलिए ये विचार टिक नहीं सके, उनकी स्वीकारोक्ति धीरे-धीरे समाप्त होती गई। इसलिए हमें यह बात समझ लेनी चाहिए कि जहां अतिवाद है वहां आदर्श नहीं। तुम्हारा कार्य ऐसा न हो जिससे समाज टूटे। भारतीय समाज ने कभी नहीं कहा कि मेरा ही भगवान सर्वश्रेष्ठ है, वरन सभी के आराध्य के प्रति श्रद्धा का भाव रखा। 

अनेक आक्रमणों के बावजूद हमारा राष्ट्र अविचल है क्योंकि हमारी सांस्कृतिक नींव पक्की है। हमें उसे केवल गढ़ना है। शिव सुंदर नव समाज हमें गढ़ना है। शिव जो सदैव कल्याण करनेवाला है, वह मंगलकारी है। और सुंदर यानी समृद्धशाली व आत्मनिर्भर।

इतिहास में हमारे राष्ट्र का उल्लेख बहुत गौरवशाली है। कल्पनातीत धन व प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर राष्ट्र के रूप में अपनी ख्याति रही है। सन 1823 में अंग्रेजों ने जब भारत का शैक्षणिक सर्वे किया तब उन्होंने पाया था कि भारत के 72 प्रतिशत जनता शिक्षित हैं। अंग्रेजों ने अपने शोषणपूर्ण नीति द्वारा आर्थिक आधार पर भारत को खूब लूटा। इसके बाद भारत में शैक्षिक पतन शुरू हो गया। इसके बाद शिक्षा के क्षेत्र में हम 72 से 17 प्रतिशत पर1947 में  पहुंच गए। हमें याद रखना चाहिए कि राकेट (प्रक्षेपास्त्र) अनुसंधान, प्लास्टिक सर्जरी तथा शैल्य चिकित्सा भारत की देन है। गुलामी के काल में भी हमने अपनी अस्मिता, अपना स्वाभिमान नहीं खोया। इस देश में वीरता की भी कोई कमी नहीं है। तुकाराम उम्बले ने मुम्बई के 26/11 के आतंकी हमले के दौरान वीरतापूर्वक आतंकी अजमल कसाब को पकड़ा था। निःशस्त्र होते हुए अपने शरीर पर आतंकी के 54 गोलियों को झेलकर तुकाराम ने आतंकी को पकड़ा, यह उसकी वीरता और देशभक्ति का प्रतीक है। तुकाराम का परिवार इसपर गौरवान्वित है। उनकी बेटी कहती है कि उनके पिता ने कर्तव्यभाव से अपना बलिदान दिया।

हमें आज समय के साथ चलनेवाला, समयानुकूल शिवसुंदर नवसमाज गढ़ना है। इस नवसमाज की संकल्पना को हमें समझना होगा। जब दलितों को न्याय दिलाना था तो डॉ. बाबा साहेब आम्बेडकर ने पहल की। उन्होंने उनके न्याय के लिए संघर्ष का रास्ता अपनाया। संघर्ष का मार्ग अपनाना उस समय के लिए आवश्यक था। पर क्या इस समय संघर्ष का मार्ग उचित है, इस पर विचार करना चाहिए। आज बाबा साहेब के नाम से संघर्ष का वातावरण समाज में बनाया जाता है। लेकिन इस समय संघर्ष की नहीं, सौहार्द्र की आवश्यकता है। इसे सबको समझना होगा। 

मुगलों ने भारत पर आक्रमण किया, तब उन्होंने देखा भारत में मूर्तिकला और स्थापत्यकला चरमोत्कर्ष पर है। आक्रान्ताओं ने जन सामान्य पर नानाविध अत्याचार किए, पर कलाविदों के प्राण नहीं लिए। कलाविदों को कैद कर आक्रान्ताओं ने अपने देश और भारत में मस्जिदें बनवाईं, उनसे कलाएं सीखीं। भारत को नष्ट करने आए आक्रान्ता भी यहां से सीख कर जाते हैं, ऐसा गुणसम्पन्न रहा है हमारा देश। अतीत में हमारा भारत जैसा गौरवशाली और वैभवशाली था, उसे उसी तरह गौरवशाली और वैभव संपन्न बनाना, इस संकल्पना को कहते हैं राष्ट्र पुनरुत्थान। हमारी सेवा निरुद्देश्य नहीं है। विश्व कल्याण के लिए भारत का उत्थान यही हमारा लक्ष्य है। लेकिन हैरत की बात है कि आजकल मूल्य लेकर भी उचित सेवा नहीं की जाती। सरकार सैलरी देती है, कर्मचारी उसके अनुरूप सेवा नहीं देता। 

प्रवास के दौरान कई लोग पूछते हैं कि आप क्या करतीं हैं।

मैं कहती हूं, "मैं विवेकानन्द केन्द्र का काम करती हूं।"

यानी क्या करते हैं?

मैं कहती हूं, - "सेवाकार्य।"

फिर वे पूछते हैं केन्द्र के कितने अनाथाश्रम और वृद्धाश्रम हैं?

मैं कहती हूं- एक भी नहीं।

वे कहते हैं फिर सेवा कैसी?

मैं कहती हूं हम ऐसे समाज की रचना के सेवाकार्य में लगे हैं जहां वृद्धाश्रम या अनाथाश्रम की आवश्यकता ही नहीं रहे। 

हमें सेवा के इस भ्रामक अवधारणा को बदलना होगा और निःस्वार्थ सेवा की संकल्पना को समाजजीवन में प्रतिष्ठित करना होगा। हमें किसी के द्वारा सेवा का सर्टिफिकेट नहीं चाहिए। केन्द्र की सेवा की अवधारणा उदात्त है। यह सही है कि बाढ़, भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदा के दौरान आत्मीयता से सारा देश सहयोग के लिए आगे आता है। ऐसे कठिन काल में निश्चित रूप से ऐसा होना चाहिए, पर आत्मीयता केवल कठिन काल में ही प्रगट न हो। समाज के प्रति आत्मीयता यह सदैव होना चाहिए। सेवा यह योजनाबद्ध होनी चाहिए। घर पर एक-दो बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना यह व्यक्तिगत सेवा का उदाहरण है। पर हम संगठित होकर सामूहिक रूप से सेवा करेंगे, - संस्कार वर्ग, आनंदालय, स्वाध्याय वर्ग, योग वर्ग के माध्यम से। एक-दो नहीं, अनेकों की सेवा संगठित रूप से करना यह हमारा मार्ग है। हम अपनी क्षमताएं बढ़ाएं, हमारा स्वभाव आदर्श होना चाहिए। अपनी क्षमताओं को बढ़ाकर, उत्तम चरित्र और सदाचार से हम विश्व कल्याण के लिए 'शिव सुंदर नव समाज' हम खड़ा करें।