Saturday, 23 January 2016

मातृभूमि

1. जिस बात में हमारी अत्यन्त श्रद्धा है और जिसमें श्रद्धा रखना राष्ट्रीयता का परिचायक भी है, वह यह है कि यह विशाल भूमि हमारी मातृभूमि है। हम सब इसके पुत्र हैं। इसकी सेवा करना हमारा कर्तव्य है तथा इस भूमि के कारण राष्ट्र के नाते जो हमारा जीवन सम्भव हुआ है, उस जीवन की कीर्ति अपनी सेवा से फैलाने का स्वाभाविक कर्तव्य हमने अपने सामने रखा है।

2. कोई आश्चर्य नहीं कि ऐसा देश, जिसकी धूलि का एक-एक कण दिव्यता से ओतप्रोत है, हमारे लिये पावनतम है, हमारी पूर्ण श्रद्धा का केन्द्र है। यह श्रद्धा की अनुभूति सम्पूर्ण देश के लिये है, उसके किसी एक भाग मात्र के लिये नहीं। शिव का भक्त काशी से रामेश्वरम जाता है, और विष्णु के विभिन्न आकारों एवं अवतारों का भक्त, इस सम्पूर्ण देश की चतुर्दिक यात्रा करता है। यदि वह अद्वैतवादी है तो जगद्गुरु शंकराचार्य के चारों आश्रम, जो प्रहरी के समान देश की चारों सीमाओं पर खड़े हैं, उसे चारों दिशाओं में ले जाते हैं। यदि वह शाक्त है- उस  शक्ति के पुजारी की जो दिव्य माँ है, विश्व की तीर्थयात्रा के लिये बावन स्थान हैं, जो बलूचिस्तान में हिंगलाज से असम में कामाक्षी पर्यन्त और कश्मीर में ज्वालामुखी से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक फैले हुए हैं। इसका यही अर्थ है कि यह देश विश्व की जननी का दिव्य एवं व्यक्त स्वरूप है।