Wednesday, 6 August 2014

पाप एक त्रुटि है

            वेदान्त पाप स्वीकार नहीं करता, भ्रम स्वीकार करता है। और वेदान्त कहता है कि सबसे बडा भ्रम है--अपने को दुर्बल, पापी, हतभाग्य कहना--यह कहना कि मुझमें कुछ भी शक्ति नहीं है, मैं यह नहीं कर सकता आदि-आदि। कारण, जब तुम इस प्रकार सोचने लगते हो, तभी तुम मानो बन्धन श्रृंखला में एक कडी और जोड देते हो, अपनी आत्मा पर सम्मोहन की एक पर्त और जमा देते हो। अतएव जो कोई अपने को दुर्बल समझता है, वह भ्रान्त है, जो अपने को अपवित्र मानता है, वह भ्रान्त है; वह जगत में एक असत् विचार प्रवाहित करता है। हमें सदा याद रखना चाहिए कि वेदान्त में हमारे इस प्रस्तुत सम्मोहन जीवन का--हमारे द्वारा स्वीकृत मिथ्या जीवन का, आदर्श के साथ समझौता कराने की कोई चेष्टा नहीं है। उसका तो परित्याग करने के लिए कहा गया है और ऐसा होने पर ही उसके पीछे जो सत्य-जीवन सदा वर्तमान है, प्रकाशित होगा, व्यक्त होगा। यह नहीं कि मनुष्य पहले कि अपेक्षा अधिक पवित्र हो जाता है, बात केवल अधिकाधिक अभिव्यक्ति की है। आवरण हटता जाता है और आत्मा की स्वाभाविक पवित्रता प्रकाशित होने लगती है। यह अनन्त पवित्रता, मुक्त स्वभाव, प्रेम और ऐश्वर्य पहले से ही हममें है। 
(VIII, )

             वेदान्त आग्रह करता है कि यह सिद्धान्त हमारी निरन्तर जागरूकता का अंग बन जाना चाहिए। प्राचीन काल में हमारे महान् सम्राटों में से अनेकों ने अपना शासकीय दायित्व पूर्ण करने के साथ-साथ इस सिद्धांत पर मनन करने और उसकी अनुभूति करने का समय प्राप्त कर लिया था। तुलनात्मक दृष्टि से आज हमाता जीवन अधिक तनावरहित है। फिर भी हम इन महान सत्यों के बारे में विचार करने और स्वयं को प्रबुद्ध बनाने का समय शायद ही कभी निकाल पाते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम अपने भीतर स्थित सम्पदा-कोष का ताला खोलने के बारे में कभी नहीं सोचते। वेदान्त इस पर बल देता है कि यदि हम अपना समय और अपनी स्वतंत्रता का सदुपयोग करें तो अपने इसी जीवन में सत्य की अनुभूति कर सकते हैं। हमें अपने स्तर पर लक्ष्य को कभी-भी निम्नस्तरीय नहीं बनाना चाहिए। वेदान्त किसी भी प्रकार के 'शौर्टकट' को प्रस्तावित नहीं करता। हमें लक्ष्य तक पहुँचने के लिए संघर्षरत रहना चाहिए और अपने जीवन को अनश्वर सत्य की लय में ढालना चाहिए।