Saturday, 5 July 2014

वेद : दैविक ज्ञान के पर्वत


    वेदों के सम्बंध में हिन्दुओं की यह धारणा है कि वे प्राचीन काल में किसी व्यक्ति विशेष की रचना अथवा ग्रंथ मात्र नहीं है। वे उसे ईश्वर की अनन्त ज्ञानराशि मानते हैं जो किसी समय व्यक्त और किसी समय अव्यक्त रहती है। टीकाकार सायणाचार्य ने एक जगह पर लिखा है, यो वेदेभ्योअ्खिलं जगत् निर्ममे - जिसने वेद ज्ञान के प्रभाव से सारे जगत् की सृष्टि की है। वेद के रचियता को कभी किसी ने नहीं देखा। इसलिए इसकी कल्पना करना भी असम्भव है। ऋषि लोग उन मंत्रों अथवा शाश्वत नियमों के मात्र अन्वेषक थे। उन्होंने आदि काल से स्थित ज्ञानराशि, वेदों का साक्षात्कार किया था।

    वे ऋषिगण कौन थे? वात्स्यायन कहते हैं, जिसने यथाविहित धर्म की प्रत्यक्ष अनुभूति की है, केवल वही ऋषि हो सकता है, चाहे वह जन्म से म्लेच्छ ही क्यों न हो। इसीलिए प्राचीन काल में जारज-पुत्र वशिष्ठ, धीवर-तनय व्यास, दासी-पुत्र नारद प्रभृति ऋषि कहलाते थे। सच्ची बात यह है कि साक्षात्कार हो जाने पर किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं रह जाता। उपर्युक्त व्यक्ति यदि ऋषि हो सकते हैं तो हे आधुनिक कुलीन ब्राह्मण , तुम सभी और भी उच्च ऋषि हो सकते हो। इसी ऋषित्व का लाभ प्राप्त करने की चेष्टा करो, अपना लक्ष्य प्राप्त करने तक रुको नहीं, समस्त संसार तुम्हारे चरणों के सामने स्वयं ही नत हो जायेगा।    
                   (V, ३४४-३४५)
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मुक्तसंग्ङोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।
सिद्ध‌‌यसिद्धयोर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥१८.२६॥

Freed from attachment, non-egoistic, endowed with courage and enthusiasm and unperturbed by success or failure, the worker is known as a pure (Sattvika) one. Four outstanding and essential qualities of a worker. - Bhagwad Gita : XVIII-26