Friday, 4 July 2014

वेद : वास्तविक धर्म का मूल

    पहले मैं तुमको वेदान्त के उदय का इतिहास बताऊँगा। इसके उद्भव के पूर्व ही भारत ने एक धर्म को पूर्ण विकसित कर लिया था। उसके स्थिर होने की प्रक्रिया बहुत वर्षों से चल रही थी। विधि-विधानपूर्ण संस्कार पहले से ही मनाये जाने लगे थे। आश्रम-धर्म की आचार-पद्धति परिपक्व हो चुकी थी। लेकिन कालान्तर में अनेक धर्मों में आडम्बरपूर्ण कर्मकाण्ड और हास्यास्पद कुरीतियाँ घुस ही जाती हैं। इनके विरुद्ध विद्रोह हुआ और महान् पुरुष वेदों के माध्यम से सत्य धर्म का उद्घोष करने के लिए आगे आये। हिन्दुओं ने इन्हीं वेदों के प्रकटीकरण से अपना धर्म पाया। उन्हें बताया गया कि वेद अनादि और अनन्त हैं। इस श्रोता-मण्डली को यह हास्यास्पद प्रतीत हो सकता है- एक ग्रन्थ अनादि-अनन्त कैसे हो सकता है किन्तु वेदों से आशय किन्हीं ग्रन्थों का नहीं है। उनका अर्थ है आध्यात्मिक नियमों का संचित कोष, जिनकी खोज विभिन्न व्यक्तियों ने विभिन्न कालों में की।

    जब तक इन पुरुषों का आविर्भाव नहीं हुआ, तब तक लोगों में यह आम धारणा थी कि ईश्वर जगत् का सृष्टा है और मनुष्य अमर है। लेकिन वहीं वे रुक गये। ऐसा समझा जाने लगा कि उससे और अधिक कुछ नहीं जाना जा सकता। तभी वेदान्त के साहसी व्याख्याकारों का आविर्भाव हुआ। वे जानते थे कि बच्चों के लिए जो धर्म अभिप्रेरित है, वह विचारकों के लिए उपयोगी नहीं हो सकता और मनुष्य तथा ईश्वर के विषय में कुछ और भी सत्य हैं।

    इस संसार का हल कहाँ है जिनकी दृष्टि बहिर्मुख है, वे उसे कभी नहीं पा सकते; उन्हें दृष्टि को अन्तर्मुख कर सत्य का पता लगाना चाहिए। धर्म का निवास अभ्यन्तर में है।                 (XI, १५०-१५१)
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मुक्तसंग्ङोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।
सिद्ध‌‌यसिद्धयोर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥१८.२६॥

Freed from attachment, non-egoistic, endowed with courage and enthusiasm and unperturbed by success or failure, the worker is known as a pure (Sattvika) one. Four outstanding and essential qualities of a worker. - Bhagwad Gita : XVIII-26