Tuesday, 29 July 2014

आत्मा की मुक्ति

    जिस प्रकार हमें आँखों के होने का ज्ञान उसके कार्यों द्वारा ही होता है, उसी प्रकर उस आत्मा को बिन उसके कार्यों के देख नहीं सकते। इसे इन्द्रियगम्य अनुभूति के निम्न स्तर पर नहीं लाया जा सकता। यह विश्व की प्रत्येक वस्तु का अधिष्ठान है, यद्यपि यह स्वयं अधिष्ठान रहित है। जब हमें इस बात का ज्ञान होता है कि हम आत्मा हैं, हम मुक्त हो जाते हैं। आत्मा कभी परिवर्तित नहीं होती। इस पर किसी कारण का प्रभाव नहीं पड सकता, क्योंकि वह स्वयं कारण है। वह स्वयं ही अपना कारण है। यदि हम अपने में कोई चीज प्राप्त कर लें, जो किसी कारण से प्रभावित नहीं होती, तो हमने अपने को जान लिया।

    मुक्ति का अमरता से अविच्छिन्न सम्बन्ध है। मुक्त होने के लिए व्यक्ति को प्रकृति के नियमों के परे होना चाहिए। नियम तभी तक है, जब तक हम अज्ञानी हैं। जब ज्ञान होता है हमें लगता है कि नियम हमारी भीतर की मुक्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इच्छा कभी मुक्त नहीं हो सकती, क्योंकि वह कार्य और कारण की दासी है। किन्तु, इच्छा के पीछे रहने वाला अहं मुक्त है और यही आत्मा है। 'मैं मुक्त हूँ'-यह वह आधार है जिस पर अपना जीवन निर्मित उसका यापन करना चाहिए। मुक्ति का अर्थ है अमरता।
(VIII, ११७)
  
    इस विश्व में, जो सदैव परिवर्तनशील है, क्या कोई वस्तु अनन्त और अपरिवर्तनशील हो सकती है? हमारे प्राचीन ऋषियों ने, जो उच्च कोटि के वैज्ञानिक थे, दृढतापूर्वक घोषणा की थी कि ऐसी वस्तु सत्य है। उन्होंने अपने मन को इन्द्रियातीत वस्तुओं से हटाकर और अपने होने के केन्द्र में एकाग्र कर इसकी खोज की थी। तब उन्होंने वास्तविक सत्य और उसके अनन्त ज्ञान का अनुभव प्राप्त किया था। इस सत्यान्वेषण की प्रक्रिया अथवा स्वानुभूति को उनके द्वारा सर्वोत्कृष्ट तकनीक में निर्मित किया गया ताकि कोई भी व्यक्ति कहीं भी इस संसार में उनके द्वारा निर्धारित निर्देशों का अनुकरण कर इस सत्य की अनुभूति कर सके।
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मुक्तसंग्ङोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।
सिद्ध‌‌यसिद्धयोर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥१८.२६॥

Freed from attachment, non-egoistic, endowed with courage and enthusiasm and unperturbed by success or failure, the worker is known as a pure (Sattvika) one. Four outstanding and essential qualities of a worker. - Bhagwad Gita : XVIII-26