Friday, 18 July 2014

वेदान्तिक कल्पना


      बहुत दूर-जहाँ तो लिपिबद्ध इतिहास और परम्पराओं का मन्द प्रकाश ही प्रवेश कर पाता है, अनन्त काल से वह स्थिर उजाला हो रहा है, जो बाह्य परिस्थितिवश कभी तो कुछ धीमा पड़ जाता है और कभी अत्यन्त उज्जवल, किन्तु वह सदा शाश्वत और स्थिर रहकर अपना पवित्र प्रकाश केवल भारत में ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विचार-जगत् में अपनी मौन अननुभाव्य, शान्त फिर भी सर्वसक्षम शक्ति से उसी प्रकार भरता रहता है, जिस प्रकार प्रातः काल के शिशिरकण लोगों की दृष्टि बचाकर चुपचाप गुलाब की सुन्दर कलियों को खिला देते हैं - यह प्रकाश उपनिषदों के तत्वों का, वेदान्त दर्शन कह रहा है।


      कोई नहीं जानता कि इसका पहले-पहल भारतभूमि में कब उद्भव हुआ। इसका निर्णय अनुमान के बल से भी कभी नहीं हो सका। विशेषतः इस विषय के पश्चिमी लेखकों के अनुमान एक-दूसरे के इतने विरोधी हैं कि उनकी सहायता से इन उपनिषदों के समय का निश्चय ही नहीं किया जा सकता। हम हिन्दू आध्यात्मिक दृष्टि से उनकी उत्पत्ति नहीं स्वीकार करते। मैं बिना किसी संकोच के कहता हूँ कि यह वेदान्त, उपनिषद्-प्रतिपाद्य दर्शन अध्यात्म राज्य का प्रथम और अन्तिम विचार है, जो मनुष्य को अनुग्रह के रूप में प्राप्त हुआ है।

(V, २१५)

 

            वेदान्तिक कल्पना एक प्रकाश किरण की तरह है जो दूर बहुत दूर अनन्त से हमारे पास तक पहुँच रही है। इसमें सम्पूर्ण सत्य की शक्ति है जो यह स्पष्ट करती है कि भारत सभी प्रकार के आक्रान्ताओं के सम्मुख कैसे निडर होकर खड़ा रहा। यह अविभाजित सम्पूर्ण सत्य के गौरव को ऊपर उठाये हुए है, अतः हमें स्मरण कराता है कि आध्यात्मिक विचारधारा में वेदान्त अंतिम शब्द है। वेदान्त का यह प्रकाश किसी किसी प्रकार से भारत में मानव जीवन के समस्त पक्षों में अन्दर तक पैठ चुका है। हमारा साहसिक प्रयास होना चाहिए कि हम इस प्रकाश को सुरक्षित रखें और बुझने दें।


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कथा : विवेकानन्द केन्द्र { Katha : Vivekananda Kendra }
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मुक्तसंग्ङोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।
सिद्ध‌‌यसिद्धयोर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥१८.२६॥

Freed from attachment, non-egoistic, endowed with courage and enthusiasm and unperturbed by success or failure, the worker is known as a pure (Sattvika) one. Four outstanding and essential qualities of a worker. - Bhagwad Gita : XVIII-26