Thursday, 17 July 2014

वेदान्त – ऋषियों की दृष्टि


      वेदान्त के साथ बड़ी सुविधा यह है कि यह किसी एक व्यक्ति पर आाधारित नहीं रहा और इसलिए स्वभावतः ही ईसाई, इस्लाम अथवा बौद्ध धर्मों की भाँति इसके मौलिक सिद्धातों को धर्माचार्यों की जीवनियों ने ग्रास या आवृत नहीं कर लिया।

 

      वेदान्त में सिद्धांत ही जीवित हैं और पैगम्बरों के जीवन मानों वेदान्त के लिए अज्ञात और गौण हैं। उपनिषदों में किसी खास पैगम्बर की चर्चा नहीं है। प्राचीन हिब्रू लोगों में भी ये विचार थे अवश्य, पर हम देखते हैं कि हिब्रू साहित्य का अधिकांश मूसा ही अधिकृत किये हुए हैं। मेरा मतलब यह कदापि नहीं कि इन पैगम्बरों का किसी राष्ट्र की धार्मिक चेतना पर जाना बुरा है, परन्तु यदि मौलिक सिद्धांत सर्वथा ओझल हों जायें तो अवश्य ही हानिकारक हैं।

 

      जहाँ तक सिद्धांतों की बात है, हम काफी हद तक सहमत हो सकते हैं, पर व्यक्तियों के बारे में भी सहमत हों, ऐसा नहीं हो सकता। व्यक्तियों का प्रभाव हमरे संवेगों पर पडता है, पर सिद्धांत हमें इससे उच्चतर स्तर पर प्रभावित करते हैं - वे हमारी सुस्थिर विचार-शक्ति को प्रभावित करते हैं।

 

      अन्ततोगत्वा सिद्धांतों की ही विजय होगी, क्योंकि मनुष्य का मनुष्यत्व इसीमें है। संवेग तो हमें अनेक बार पशुओं की श्रेणी तक खींचकर ले आाते हैं। संवेगों का सम्बंद्ध बुद्धि से अधिक इन्द्रियों से है। और इसलिए सिद्धांत जब पूर्णतः तिरोहित हो जाते हैं और संवेगों का ही बोलबाला रह जाता है, तब धर्म का अधःपतन, धर्मान्धता तथा साम्प्रदायिक कट्टरता के रूप में होता है। वैसी स्थिति में वे राजनीतिक दलबन्दियाँ ही रह जाते हैं।

 

      अत्यन्त उग्र भ्रान्त धारणायें अपनाई जाती हैं उनके नाम पर हजारों अपने बन्धु-बान्धवों की गर्दन काटने के लिए तैयार हो जाते हैं। यही वजह है कि ये महापुरुष तथा पैगम्बर मानवता के कल्याण के महान प्रेरक हैं, फिर भी इनके जीवन तब अत्यन्त अहितकर साबित होते हैं जब वे अपने आाधारभूत सिद्धांतों के ही प्रतिकूल जन-समुदायों को ले चलने लगते हैं। इससे सदा धर्मान्धता का सूत्रपात हुआ है तथा संसार रक्त से आप्लावित होता रहा है।

 

      वेदान्त ऐसी कठिनाइयों से परे है, क्योंकि इसका कोई एक विशेष पैग़म्बर नहीं। इसके अनेकों दृष्टा हुए हैं, जो ऋषि कहे जाते हैं। ये दृष्टा इसलिए कहे जाते हैं कि इन्होंने सत्य अर्थात् मन्त्रों का दर्शन किया था।

(II, २४०-२४१)


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कथा : विवेकानन्द केन्द्र { Katha : Vivekananda Kendra }
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मुक्तसंग्ङोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।
सिद्ध‌‌यसिद्धयोर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥१८.२६॥

Freed from attachment, non-egoistic, endowed with courage and enthusiasm and unperturbed by success or failure, the worker is known as a pure (Sattvika) one. Four outstanding and essential qualities of a worker. - Bhagwad Gita : XVIII-26