Tuesday, 1 July 2014

मानव-निर्मात्री शिक्षा


    तुम किसी पौधे को ऐसी ज़मीन में नहीं उगा सकते, जो उसके उपयुक्त न हो। बालक अपने आप ही सीख लेता है। तुम तो उसे उसके ही मार्ग में आगे बढ़ने के लिए सहायता मात्र दे सकते हो। तुम उसके लिए, जो कर सकते हो, वह वह कोई विधेयात्मक नहीं, वरन् निषेधात्मक यानी विघ्न-निवारण रूप हो सकता है। तुम उसके मार्ग की कठिनाइयों को दूर कर सकते हो, पर ज्ञान तो उसके अपने स्वभाव से ही उत्पन्न होता है। जमीन को कुछ पोली कर दो, जिससे अंकुर आसानी से फूट सके।

    उसके चारों ओर एक घेरा बना दो, सावधानी रखो कि कोई उसे नष्ट न कर डाले, पाला या बर्फ से उसका नाश न हो जाये। बस यहीं तुम्हारे कर्त्तव्य की इतिश्री हो जाती है। इससे अधिक और कुछ तुम नहीं कर सकते। शेष सब तो उसकी प्रकृति के भीतर से ही अभिव्यक्त होता है। यही बात बालक की शिक्षा के सम्बन्ध में भी है। बालक अपने को स्वयं ही शिक्षा देता है। तुम मेरी बात सुनने आये हो। घर जाकर, तुमने भी सोची थी; मैंने तो उस बात को मात्र प्रकट किया है। मैं तुम्हें किसी बात की शिक्षा नहीं दे सकता। शिक्षा तो तुम स्वयं ही अपने को दोगे। मैं तो शायद तुम्हें अपने उस विचार को प्रकट करने में सहायता ही दे सकूँ।

    शिक्षा से मेरा तात्पर्य वर्तमान प्रणाली से नहीं है परन्तु कुछ ऐसा है जो सकारात्मक शिक्षण की ओर ले जाता है। केवल पुस्तक पढने से नहीं चलेगा। हम वह शिक्षा चाहते हैं जिससे चरित्र-निर्माण होता है, मानसिक शक्ति में वृद्धि होती है, बुद्धि का विस्तार होता है और जिससे व्यक्ति अपने पैरों पर खडा हो सकता है।
(IX, ५५)
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मुक्तसंग्ङोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।
सिद्ध‌‌यसिद्धयोर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥१८.२६॥

Freed from attachment, non-egoistic, endowed with courage and enthusiasm and unperturbed by success or failure, the worker is known as a pure (Sattvika) one. Four outstanding and essential qualities of a worker. - Bhagwad Gita : XVIII-26