Sunday, 29 June 2014

सत्य और छाया


    सभी आधुनिक धर्म इस विचार से प्रारंभ होते हैं कि मनुष्य एक समय पवित्र था, उसका पतन हुआ और वह पुनः पवित्र होगा। मैं नहीं समझता, उनको यह विचार कहाँ से प्राप्त हुआ।

    ज्ञान का स्थान आत्मा है, बाह्य वातावरण केवल आत्मा को उद्दीप्त करता है; ज्ञान आत्मा की शक्ति है। शताब्दियों से वह शरीर निर्माण करती है। अवतार के विभिन्न रूप, आत्मा की जीवन-कथा के केवल क्रमगत अध्याय हैं। हम निरन्तर अपने शरीर का निर्माण कर रहे हैं। सम्पूर्ण विश्व प्रवाह, परिवर्तन, प्रसार और आकुंचन की स्थिति में हैं।

    वेदान्त मानता है कि तत्त्वतः आत्मा कभी नहीं बदलती, किन्तु वह माया द्वारा रूपान्तरित होती है। प्रकृति, मन द्वारा सीमित ईश्वर है। प्रकृति का विकास आत्मा का रूपान्तर है। सभी प्रकार के जीवों में आत्मा वही है। उसकी अभिव्यक्ति शरीर द्वारा रूपान्तरित होती है। आत्मा की यह एकता, मानवता का यह सामान्य तत्व नीति-शास्त्र और नैतिकता का आधार है। इस अर्थ में सब एक हैं और अपने भाई को चोट पहुँचाना स्वयं अपने को चोट पहुँचाना है।

    "प्रेम केवल इस असीम एकता की एक अभिव्यक्ति है। किस द्वैत प्रणाली पर आप प्रेम की व्याख्या कर सकते हैं?"

    "वह क्या है, जो हम सब खोजते हैं? मुक्ति। जीवन का सारा प्रयत्न और संघर्ष मुक्ति के लिए है। वह महाजातियों, संसारों और प्रणालियों की विश्वयापी यात्रा है।"

    "यदि हम बद्ध हैं तो हमें किसने बाँधा? असीम को स्वयं उसीके अतिरिक्त और कोई शक्ति नहीं बाँध सकती।"     
                                
                                            (VI, २८४-२८५)


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मुक्तसंग्ङोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।
सिद्ध‌‌यसिद्धयोर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥१८.२६॥

Freed from attachment, non-egoistic, endowed with courage and enthusiasm and unperturbed by success or failure, the worker is known as a pure (Sattvika) one. Four outstanding and essential qualities of a worker. - Bhagwad Gita : XVIII-26