Saturday, 28 June 2014

समष्टि में व्यष्टि



    समष्टि में व्यष्टि तो सृष्टि की योजना है। चेतना के उद्भव में हर कोशिश का कार्य होता है। मनुष्य, व्यष्टि है और ठीक उसी समय समष्टि भी है। अपने व्यक्तिगत स्वरूप की सिद्धी ही हम अपने राष्ट्रीय और विश्वव्यापी स्वभाव की सिद्धी करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति एक निःसीम वृत्त है, जिसका केन्द्र सर्वत्र है और परिधि कहीं नहीं। साधना से हर कोई विश्वात्मा का अनुभव करता है यही हिन्दू धर्म का तत्व है। जो हर जीव में अपनी ही आत्मा को देखता है, पंडित (मुनि) है।

    ऋषिगण आध्यात्मिक नियमों के आविष्कारक हैं।

    अद्वैतवात में जीवात्मा नहीं होती; वह केवल एक भ्रम है। द्वैतवाद में एक जीव होता है, जो ईश्वर से असीम रूप से भिन्न होता है। दोनों ही सत्य हैं। जैसे एक व्यक्ति झरने पर जाये और दूसरा पोखरे पर। जहाँ तक हमारी चेतना जाती है, वास्तव में हम सभी द्वैतवादी हैं; पर उससे परे? उससे परे हम अद्वैतवादी हैं। वास्तव में केवल यही सत्य है।

    अद्वैतवाद के अनुसार हर मनुष्य से अपने जैसा ही प्रेम करो, अपने भाई जैसा नहीं, जैसाकि ईसाई धर्म में है। विश्वबन्धुत्व नहीं, विश्वात्मा-भाव हमारा आदर्श है। अद्वैतवाद में (उपयोगितावादी) सर्वोत्तम सुख का सिद्धांत भी सम्मिलित हो सकता है।

    सोङहं - मैं वह हूँ। अनवरत इस विचार का जप करो; पहले ससंकल्प, तब वह अभ्यास से स्वचालित हो जाता है। वह स्नायुतन्तुओं तक पैठ पा जाता है। इस प्रकार रटने से, बारम्बारता पुनरूक्ति से, यह विचार स्नायु-तन्तुओं में भी भर देना चाहिए।

(I, ३०३-३०४)

    स्वामीजी हमें यहाँ एक बहुत व्यावहारिक सुझाव उपलब्ध करवाते हैं कि आत्मा के दैवत्व (सोङहं) के विचार को हमारे स्नायु-तन्तुओं में धडकने दें ताकि हमारा जीवन उसकी लय के साथ स्पन्दन करना प्रारंभ कर दे।
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मुक्तसंग्ङोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।
सिद्ध‌‌यसिद्धयोर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥१८.२६॥
Freed from attachment, non-egoistic, endowed with courage and enthusiasm and unperturbed by success or failure, the worker is known as a pure (Sattvika) one. Four outstanding and essential qualities of a worker. - Bhagwad Gita : XVIII-26