Saturday, 21 June 2014

ज्ञान द्वारा आत्मानुभूति



    आत्मा लिंग-भेद रहित है। आत्मा के विषय में यह नहीं कह सकते कि वह पुरुष है या स्त्री।

    यह स्त्री और पुरूष का भेद तो केवल देह के संबंध में है। अतएव आत्मा पर स्त्री-पुरूष का भेद करना केवल भ्रम मात्र है - यह लिंग-भेद शरीर के विषय में ही सत्य है। आत्मा की आयु का भी निर्देश नहीं किया जा सकता। वह पुरातन पुरूष सदा समस्वरूप ही में विद्यमान है। तो यह आत्मा संसार में बद्ध किस प्रकार हो गयी?

    इस प्रश्न का केवल एक ही उत्तर शास्त्र देते हैं। अज्ञान ही इस समस्त बंधन का कारण है। हम अज्ञान केे ही कारण बंधे हुए हैं।

    ज्ञान से अज्ञान दूर होगा, यही ज्ञान हमें उस पार ले जायेगा। तो इस ज्ञान प्राप्ति का क्या उपाय है? - प्रेम और भक्ति से, ईश्वर आराधना द्वारा और सर्वभूतों को परमात्मा का मंदिर समझकर प्रेम करने से ज्ञान प्राप्त होता है। इस प्रकार अनुराग की प्रबलता से ज्ञान का उदय होगा और अज्ञान दूर होगा, सब बन्धन टूट जायेंगे और आत्मा को मुक्ति मिलेगी।    
(V, २७)

    उपर्युक्त अंश स्वामीजी द्वारा 'वेदान्तवाद' पर जाफना में दिये गए व्याख्यान का है। यह प्रथम अवसर था जब सम्पूर्ण विश्व, भारत सहित सभी, उपनिषदों में वर्णित आश्चर्यजनक आदर्शों को संक्षिप्त, वैज्ञानिक और विचारपूर्ण भाषा में दत्तचित्त होकर सुन रहा था। अतः आश्चर्य नहीं कि उन्हें 'वेदान्त केसरी' की उपाधि से सुशोभित किया गया।

    वे चाहते थे कि भारतीय बालक/बालिका के लालन-पालन में उपनिषदों के आदर्शों का पालन किया जाये। वे कहा करते थे, "बचपन से ही अपनी संतान को सशक्त बनाओ। उन्हें किसी भी प्रकार की दुर्बलता और अर्थहीन कर्मकाण्ड नहीं सिखाने चाहिए। उन्हें अपने पैरों पर खडा होना सिखाइये। उन्हें आत्म-गौरव सीखने दीजिए। वे अकेले ही वेदान्त में प्रवेश करेंगे। वेदान्त में भी साहस और उदारता से परिपूर्णता के रूप में विकसित होने के अादर्श हैं।" सर्वप्रथम उन्हें प्रेम, पूजा इत्यादि जो अन्य धर्मों मे पाये जाते हैं स्वयं को केन्द्रित होने दीजिए, परन्तु अपने अन्तर्मन में अात्मसात होना सर्वाधिक प्रेरणास्पद, सर्वाधिक आश्चर्यजनक है। केवल वेदान्तिक धर्म ही इस भौतिकवादी संसार का धर्म का सर्वोच्च सत्यों के साथ सामंजस्य स्थापित कर सकता है।

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मुक्तसंग्ङोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।
सिद्ध‌‌यसिद्धयोर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥१८.२६॥

Freed from attachment, non-egoistic, endowed with courage and enthusiasm and unperturbed by success or failure, the worker is known as a pure (Sattvika) one. Four outstanding and essential qualities of a worker. - Bhagwad Gita : XVIII-26