Friday, 20 June 2014

अनुभव द्वारा ज्ञान



हम अपना समस्त ज्ञान अनुभव के द्वारा प्राप्त करते हैंं और जिन्हें हम अनुभव कहते हैं, वे चेतना के स्तर पर ही होते हैं। उदाहरणत: कोई मनुष्य पियानो पर कोई धुन बजाता है। वह प्रत्येक सुर पर अपनी अंगुली जान-बूझकर रखता है। इस क्रम की आवृत्ति वह तब तक करता जाता है, जब तक उसकी अंगुलिया अभ्यस्त नहीं हो जातीं। अभ्यस्त होने पर प्रत्येक सुर पर बिना विशेष ध्यान दिए ही वह उस धुन को बजाता है।

ठीक उसी तरह हम अपने बारे में भी देखते हैं कि हमारी प्रवृत्तियाँ हमारे अतीत के संचित कर्मों के ही परिणामस्वरूप हैं। कोई भी बच्चा कुछ खास प्रवृतियों के साथ पैदा होता है। वे कहाँ से आतीं है? कोई भी बच्चा अनुत्कीर्णफलक (tabula rasa)–सादे पन्ने की तरह कोरा मन लेकर पैदा नहीं होता। उसके मन रूपी पन्ने पर पहले से ही कुछ लिखा रहता है।

यूनान और मिस्त्र के प्राचीन दार्शनिकों ने बताया है कि कोई भी बच्चा शून्य मन लेकर नहीं आता। प्रत्येक बच्चा अपने पूर्वकृत कर्मों से उत्पन्न सैकडों प्रवृत्तियों  के साथ उत्पन्न होता है। इस जन्म में तो उसने उन्हें पाया नहीं। तब हम यह मानने को बाध्य हो जाते हैं कि अवश्य ही वे उसके पिछले जन्म की हैं।

परले सिरे के भौतिकवादी को भी यह मानना पडता है कि वे प्रवृत्तियाँ पिछले कर्मों के परिणामस्वरूप हैं। हाँ, इतना वे अवश्य जोड देते हैं कि वे वंशानुगत हैं। आनुवांशिकता के इस नियम के अनुसार हमारे पिता, पितामह, प्रतिमाहों की परम्परा हम तक आती है। अब अगर इन्हें वंशानुगत कहने से ही व्याख्या पूरी हो जाती है, तो अात्मा में में विश्वास करने की कोई आवश्यकता नहीं; क्योंकि शरीर ही सबकी व्याख्या कर देता है।

खैर, हमें भौतिकवाद और आत्मवाद के तर्कों में उलझना नहीं है। जो वैयक्तिक आत्मा में विश्वास करते हैं, उनके लिए यहाँ रास्ता साफ है। इस तरह हम देखते हैं कि किसी समुचित निष्कर्ष पर पहँचने के लिए यह मानना जरूरी हो जाता है कि हमारे पिछले जीवन भी रहें हैं। अतीत और वर्तमान के महान् दार्शनिकों एवं महर्षियों का यही विश्वास है।
(II, २३०-२३१)
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मुक्तसंग्ङोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।
सिद्ध‌‌यसिद्धयोर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥१८.२६॥

Freed from attachment, non-egoistic, endowed with courage and enthusiasm and unperturbed by success or failure, the worker is known as a pure (Sattvika) one. Four outstanding and essential qualities of a worker. - Bhagwad Gita : XVIII-26