Tuesday, 17 June 2014

मन का विस्तार और उसका नियन्त्रण

मनुष्य की प्रत्येक प्रवृत्ति उसकी अतीत कर्मसमष्टि की उस रेखा या अर्धव्यास की परिचायक है, जिस पर मनुष्य को चलते रहना चाहिए। सभी अर्धव्यास केन्द्र में ले जाते हैं। किसीकी प्रवृत्ति को पलट देने का नाम तक मत लो, उससे गुरू और शिष्य दोनों को क्षति पहुँचती है। जब तुम ज्ञान की शिक्षा देते हो तो तुम्हें ज्ञानी होना होगा, और जो अवस्था शिष्य की होती है, तुम्हें मन ही मन ठीक उसी अवस्था में पहुँचना होगा। अन्यान्य योगों में भी तुम्हें ठीक ऐसा ही करना होगा। प्रत्येक प्रवृत्ति का विकास-साधन इस रूप में करना होगा कि जैसे उस वृत्ति को छोड अन्य कोई वृत्ति हमारे लिए है ही नहीं-यह है तथाकथित सामंजस्यपूर्ण उन्नति-साधन का यथार्थ रहस्य-अर्थात् गम्भीरता के साथ उदारता का अर्जन करो, किन्तु उसे खो मन दो। हम अनन्त स्वरुप हैं-हम सभी किसी भी प्रकार की सीमा के अतीत हैं। अतएव हम परम निष्ठावान मुसलमानों के समान प्रखर औैर सर्वाधिक घोर नास्तिक के समान उदार भावापन्न हो सकते हैं।

ऐसा करने का उपाय है-मन का किसी विषयविशेष में प्रयोग न करके स्वयं मन का ही विकास करना और उसका संयम करना। इससे तुम्हें तीव्रता और विस्तार दोनों ही प्राप्त होंगे। ज्ञान की उपलब्धि इस भाव से करो कि ज्ञान छोडकर मानो और कुछ है ही नहीं; उसके बाद भक्तियोग, राजयोग और कर्मयोग को भी लेकर इसी भाव से साधना करो। तरंग को छोडकर समुद्र की ओर जाओ, तभी तुम स्वेच्छानुसार विभिन्न प्रकार की तरंगों का उत्पादन कर सकोगे। तुम अपने मनरूपी सरोवर को संयत रखो, ऐसा किए बिना तुम दूसरों के मनरूपी सरोवर का तत्व कभी नहीं जान सकोगे।

(V11,११५-११६)


"सच्चा गुरू वह जो शिष्य के मन भीतर प्रवेश कर सकता है और उसकी इच्छा-शक्ति का उपयोग कर अन्तर्मन में परिवर्तन ला सकता है। इस हेतु, गुरू का मन सहानुभूति और समझ से समृद्ध होना चाहिए।

सर्वप्रथम गुरू को यह पता लगाना पडता है कि शिष्य में संसार के गलत प्रभाव क्यों हैं। तभी गुरू उन गलत प्रभावों सही करके उनके स्थान पर शुद्ध ज्ञान पर आधारित उच्च सकारात्मक प्रभावों को स्थानापन्न कर सकता है।"