Tuesday, 7 May 2013

स्वामी कल्याणदेव: स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रदीप्त ज्योति

वीरेश्वराय विद्महे विवेकानन्दाय धीमहि । तन्नो वीर: प्रचोदयात् ।
स्वामी कल्याणदेव का जन्म मुजफ़्फ़रनगर जिले के मुण्डभर गाँव के निवारी फेरूदत्त की धर्मपत्नी भोई देवी की कोख से तीसरे पुत्र के रूप में अपने ननिहाल बागपत जिले के कोताना गाँव में 21 जून 1876 ई. के दिन हुआ था। नाम रखा गया - कालूराम।

बाल्यकाल में कालूराम को बुढ़ाना में अपनी बुआ सुरजी के यहां जाने का मौका मिला। उनके फूफा बुल्ला भगत वहाँ की बड़े जमींदार थे। घर में किसी बात की कोई कमी नहीं थी, पर संतान का अभाव उन्हें बड़ा खटकता था। इसीलिए उन्होंने भगवान भक्ति तथा संतों की सेवा में मन लगाया। । बल्ला भगत की साधु-सेवा की ख्याति ऐसी फैली कि उनके द्वार पर हमेशा साधु-संतों का जमघट लगा रहता था। उनके यहाँ प्रतिदिन सुबह-शाम रामकथा तथा भजन-कीर्तन होता और उसके बाद प्रसाद-वितरण भी होता।

यह सब देख कालूराम को बड़ा आनन्द होता। वह बड़े सवेरे ही नहा-धोकर तैयार हो जाता और अपने फूफाजी के पास ही काठ के तख्त पर बैठकर ध्यानपूर्वक कथा सुनता। बचपन में सुने गए रामायण के प्रसंगों की कालूराम के हृदय पर गहरी छाप पड़ी और उसमें निरूपित चरित्र ही उसके लिए आदर्श बन गये। एक दिन वे अपने फूफा का घर छोड़कर साधु-सन्तों के साथ निकल गये। उस समय उनके शरीर पर एक लंगोटी तथा एक सूती चादर के सिवा और कुछ न था।

खाली हाथ और नंगे पैर भिक्षाटन करते और मार्ग पूछते हुए कालूराम अयोध्या पहँच गए। वहाँ उनकी भेंट स्वामी रामदास से हुई, जिनसे उन्होंने अक्षर-बोध सीखा। अव वे रामाचण का हिन्दी भाषान्तर स्वयं पढ़ सकते थे। अयोध्या में ही उन्हें हरिद्वार-तीर्थ के बारे में जानकारी मिली।
कुछ दिन अयोध्या में बिताने के बाद कालूराम ने हरिद्वार की राह ली। हरिद्वार पहँचने के बाद वे वहाँ के कई आश्रमों में आते-जाते रहे। वहाँ वे कथा-कीर्तन सुनते, साधु-महात्माओं की संगति करते और भूख लगने पर भिक्षा माँग कर खा लेते। इन्हीं दिनों उन्होंने खेतड़ी जागर स्वामी विवेकानन्द के दर्शन किए तथा उनसे कुछ शिक्षा भी पायी।

खेतड़ी से वापस हरिद्वार लौटने के बाद उनके मन में किसी गुरु से दीक्षा लेने की प्रबल इच्छा उत्पन्न हुई। अपने लिए उपयुक्त गुरु की खोज में कालूराम ऋषिकेश में स्थित मुनि की रेती पहँचे, जहाँ उनकी भेंट स्वामी पूर्णानन्द जी महाराज से हुई। सरल तथा निर्मल चित्त वाले पूर्णानन्द जी ने कालूराम की प्रार्थना स्वीकार कर ली। कालूराम की सेवा परायणता देखकर उन्होंने 1900 ई. में उन्हें संन्यास के व्रत में दीक्षित करके उन्हें स्वामी कल्याण देव नाम दे दिया। इसके बाद गुरुदेव के आदेश पर उत्तराखण्ड में ही रहकर घोर तपस्या की और तदुपरांत वे विविध प्रकार की लोकोपकारी कार्यों में जुट गये। उन्हीं दिनों आरम्भ किया गया उनका यह ‘सेवा-यज्ञ’ उनके सुदीर्घ जीवन-काल के लगभग सौ वर्षों तक अबाध गति से चलता रहा।

स्वामी विवेकानन्द से भेंट:
खेतड़ी में स्वामी विवेकानन्द से भेंट उनके जीवन की एक युगान्तरकारी घटना थी। स्वामी विवेकानन्द 9 दिसंबर 1897 को राज-अतिथि के रूप में खेतड़ी पहँचे। वहाँ महाराजा के ‘सुख-महल’ नामक उद्यान-भवन में उनके निवास की व्यवस्था हुई थी और वहीं पर वे तीन सप्ताह ठहरे।

स्वामी कल्याणदेव उन दिनों एक 20 वर्षीय युवक कालूराम के रूप में सम्भवतः हरिद्वार में निवास करते थे। उन्होंने जब सुना कि विश्वविश्रुत स्वामीजी देहरादून से दिल्ली, अलवर तथा जयपुर होते हुए खेतड़ी जा रहे हैं, तो उनके मन में स्वामी जी से मिलने की उत्कण्ठा हुई। अतः वे जयपुर की ओर चल दिये। वहां पहुंचकर खेतड़ी हाउस से उन्हें सूचना मिली कि स्वामीजी खेतड़ी के लिए प्रस्थान कर चुके हैं और वहीं से जोधपुर, अजमेर आदि होते हुए अन्य मार्ग से कलकत्ते लौटेंगे। उन दिनों खेतड़ी जाने के अधिक साधन आदि उपलब्ध न थे, अतः युवक कालूराम पैदल ही वहाँ के लिए रवाना हुआ।

खेतड़ी के एक उद्यान-भवन में उसकी स्वामी विवेकानन्द के साथ भेंट हुई। ‘अमर-उजाला’ दैनिक के 14 अक्टूबर 2003 ई. के अंक में प्रकाशित एक साक्षात्कार में 127 वर्षीय स्वामी कल्याणदेव जी से पूछा गया था - ‘‘गाँव-गाँव में जाकर समाज-सेवा करने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?’’ उन्होंने उत्तर दिया - ‘‘सन् 1897 में खेतड़ी (राजस्थान) में स्वामी विवेकानन्द जी से भेंट हुई थी। उन्होंने कहा था कि भगवान् के दर्शन करने हैं तो गरीब की घोपड़ी में जाना और भगवान् को पाना है तो गरीबों, असहाय लोगों, दीन-दुखियों की सेवा करना। सेवा में ही भगवान् को पाने का ऐसा मन्त्र मिला कि उसे कभी भूल नहीं पाया।’’

एक अन्य विवरण के अनुसार इस भेंट के दौरान स्वामीजी ने कालूराम से कुछ और भी बातें कहीं थी। उन्होंने कहा था - (1) भगवान के दर्शन गरीब की झोपड़ी में होंगे। (2) भगवान के दो बेटे हैं - किसान और मजदूर। (3) जब तुम प्रातःकाल उठकर घर से निकलोगे, तो तुम्हारे कानों में दो तरह की आवाज़ें आयेंगी - ‘हाय राम, मैं मरा’। पहले तुम कराहते दीन-दुखी लोगों के पास जाओ और अपनी सामथ्र्य के अनुसार उनके दुःख दूर करने के प्रयास करो। उसके बाद ही तुम मन्दिर में जाना स्वामीजी की इन बातों ने ब्रह्मचारी कालूराम के मन पर अमिट छाप छोड़ी और कुछ काल बाद सन्यास लेने के उपरान्त वे अगले सौ वर्षों से भी अधिक काल तक गाँव-गाँव पैदल घूमकर दीन-दुखियों, निर्धनों तथा किसान-मजदूरों की सेवा करते रहे।

संस्थाओं के संस्थापक:
करीब सौ वर्षों के अपने सक्रिय कार्यकाल के दौरान पूरी मानवता और विशेषकर ग्रामीण-समाज के कल्याणार्थ उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, दिल्ली तथा देश के अनेक प्रान्तों में राष्ट्रीय महत्त्व की लगभग 300 संस्थाएँ स्थापित कीं। इनमें प्रमुख हैं - तकनीकी शिक्षा केन्द्र, आयुर्वेद मेडिकल काॅलेज, माध्यमिक विद्यालय, नवोदय विद्यालय, कन्या विद्यालय, जूनियर हाई स्कूल, प्राथमिक विद्यालय, चिकित्सालय तथा औषधालय, नेत्र चिकित्सालय, संस्कृत पाठशालाएँ, उद्योगशाला, अम्बेडकर छात्रावास, धर्मशालाएँ मूक-बधिर तथा अन्ध विद्यालय, योग-प्रशिक्षण केन्द्र, वृद्धाश्रम, वृद्ध गायों के लिए पिंजरापोल, अनाथालय, शहीद-स्मारक और अनेक धार्मिक तथा अध्यात्मिक केन्द्र आदि।

उनके द्वारा स्थापित शिक्षण-संस्थाओं में हर जाति-धर्म के गरीब तथा अमीर बालक-बालिकाएँ शिक्षण तथा प्रशिक्षण पाते हैं। सैकड़ों संस्थाओं के संस्थापक होने के बावजूद वे उनमें कोई पदाधिकारी नहीं बने। इसके सिवा उन्होंने बाल एवं नारी-कल्याण, स्वदेशी का प्रचार, अछूतोद्धार, मद्यनिषेध, पर्यावरण-सुरक्षा, साम्प्रदायिक एकता और बाल-विवाह आदि की प्रथा को दूर करने के लिए बहुत-सा कार्य किया।

प्राचीन तीर्थों का जीर्णोद्धार:
समाज-सेवा के अतिरिक्त स्वामीजी ने कई धार्मिक तथा ऐतिहासिक स्थलों का जीर्णोद्धार भी कराया था। मेरठ से 60 कि.मी. उत्तर में स्थित श्रीमद्भागवत के प्रवक्ता परमहंस शुकदेव की स्मृतियों से जुड़े प्राचीन तीर्थ शुक्रताल (जिला मुजफ्फर नगर) का उन्होंने जीर्णोद्धार कराया और वहाँ ‘शुकदेव आश्रम सेवा-समिति’ की स्थापना की। इसके अलावा कौरवों-पाण्डवों की राजधानी हस्तिनापुर (मेरठ जिला) और हरियाणा के भी अनेक तीर्थों का जीर्णोद्धार कराया।

दरिद्र-नारायण के पुजारी:
127 वर्ष की आयु में भी अहर्निशं सेवामहे का संकल्प धारण किये वे दरिद्र-नारायण की सेवा में अपने जीवन का एक-एक पल सार्धक बनाने में जुटे रहे। उन्हें किसी रोग-शोक या चिन्ता का भय नहीं था। उनका जीवन इतना सरल-सहज था कि प्रातः 5 बजे से लेकर रात 10 बजे तक उनके द्वार पर दीन-दुःखी, निर्धन तथा सामान्य लोगों की भीड़ लगती रहती थी। वे लोगों के दुःख-दर्द तथा समस्याओं की बातें सहानुभूति तथा ध्यानपूर्वक सुनते और उन्हें पूरा सम्मान देतु हुए तत्परता सहित उनका समुचित निराकरण करते।

1915 ई. में वे महात्मा गांधी से मिले। पं. मदनमोहन मालवीय, पं. जवाहरलाल नेहरू, श्री लाल बहादुर शास्त्री, डा. राजेन्द्र प्रसाद, डा. सम्पूर्णानन्द आदि विभूतियों के साथ भी उनका सम्पर्क रहा। 1982 में उन्हें ‘पùश्री’ तथा 2000 में ‘पùभूषण’ की उपाधि से अलंकृत किया गया। 2002 में उन्हें मेरठ विश्वविद्यालय द्वारा डी. लिट. की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। 2002 में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उनके सम्मान में प्रकाशित ‘तीन सदी के युगद्रष्टा - स्वामी कल्याणदेव’ शीर्षक अभिनन्दन-ग्रन्थ का लोकापर्ण किया। 14 जुलाई 2004 को 129 वर्षीय ‘तीन शताब्दियों के द्रष्टा’ राष्ट्र संत वीतराग संन्यासी स्वामी कल्याणदेव जी महाराज लोखों लोगों को शोकमग्न करते हुए चिरसमाधि में विलीन हो गए।