Wednesday, 15 May 2013

राष्ट्रीय चेतना की त्रिवेणी

वीरेश्वराय विद्महे विवेकानन्दाय धीमहि । तन्नो वीर: प्रचोदयात् ।

राष्ट्रीय चेतना के उन्नायक भारतीय महापुरूषों में स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द और स्वामी रामतीर्थ - ये तीनों पावन त्रिवेणी के रूप में इतिहास-प्रतिष्ठ हैं। स्वामी विवेकानन्द का आविर्भाव उस युग में हुआ था, जिसे इतिहास की दृष्टि से उन्नीसवीं शती का युग कहा जाता है। उस शती के अंगरेज़ीदाँ हिन्दू अपने अन्धविश्वास से ग्रस्त धर्म के कुपरिणामों को समझने लगे थे। धर्म पर से उनकी श्रद्वा विचलित होने लगी थी। इसी संक्रान्ति-युग में, युग पुरूष स्वामी विवेकानन्द को अपने सामने कई प्रकार के उद्देश्य दिखाई पड़े, जिनमें मुख्य उद्देश्य था-राष्ट्र धर्म की पुन: स्थापना करके जनजीवन में राष्ट्रीय चेतना को जगाना। क्योंकि, बुद्विवादी मनुष्यों की श्रद्वा धर्म पर से केवल भारत में ही नहीं, सभी देशों में हिलती जा रही थी। अतएव, आवश्यकता इस बात की थी कि धर्म की ऐसी व्याख्या की जाए, जो अभिनव समाज को ग्राह्य हो और मानव-कल्याण के सन्दर्भ में उसके विकास-विस्तार की दिशा में बाधक बने। ज्ञातव्य है, जो धर्म, धर्म का बाधक बनता है, वह धर्म नहीं कुधर्म है।

दूसरा उद्देश्य था - हिन्दू-धर्म पर हिन्दुओं की श्रद्वा को अविचल बनाये रखना; क्योंकि हिन्दू यूरोप के प्रभाव में आ चुके थे तथा अपने धर्म और इतिहास पर भी वे तब तक वे विश्वास करने को तैयार नहीं थे, जब तक यूरोप के लोग उनकी प्रशंसा नहीं करें और फिर तीसरा उद्देश्य था - भारतवासियों में अपने राष्ट्र के प्रति आत्मगौरव भावना को सुदॄढ़ करना, उन्हें अपनी संस्कृति, इतिहास, राष्ट्रीयता और आध्यात्मिक परम्परा का पुन: योग्य उत्तराधिकारी बनाना। 

स्वामी विवेकानन्द राष्ट्र-धर्म और संस्कृति के नेता थे। उनका धर्म राष्ट्रीयता को उत्तेजना देने वाला था। नई पीढ़ी खासकर युवा पीढ़ी के लोगों में उन्होंने भारत के प्रति राष्ट्रभक्ति जगाई, और उसके महनीय अतीत के प्रति पूर्ण गौरव तथा भविष्य के प्रति प्रबल आस्था उत्पन्न की। उनके राष्ट्रीय चेतना से सिक्त उद्‌गारों से भारतीय जनता में आत्मनिर्भरता और आत्माभिमान के भाव जगे। स्वामी जी का वैशिष्ट्‌य इस बात के लिए ध्यातव्य है कि उन्होंने सुस्पष्ट रूप से राजनीति का कोई भी सन्देश नहीं दिया, किन्तु जो भी उनके तथा उनकी रचनाओं के सम्पर्क में आया, उसके मन में देशभक्ति और राजनीतिक मानसिकता या राष्ट्र चेतना आप-से-आप उत्पन्न हो गई। विवेकानन्द वह अगाध समुद्र है, जिसमें धर्म और राजनीति, राष्ट्रीयता और अन्तरराष्ट्रीयता तथा औपनिषदिक और वैज्ञानिक चिन्तन, सब-के-सब एक साथ समाहित हैं। इसीलिए रवीन्द्रनाथ ने कहा है - "यदि कोई भारत राष्ट्र को समझना चाहता है, तो उसे स्वामी विवेकानन्द को पढ़ना चाहिए।"

भारत में साँस्कृतिक राष्ट्रीयता पहले उत्पन्न हुई, राजनीतिक राष्ट्रीयता बाद में आई। इस दृष्टि से विचार करें तो स्वामी विवेकानन्द इस सांस्कृतिक राष्ट्रीयता के जनक थे। महषि अरविन्द की आध्यात्मिक साधना की चर्चा के बिना राष्ट्रीय चेतना के जागरण का विवरण अपूर्ण ही रहेगा। अरविन्द आरम्भ से, अंगरेज़ी के कवि और चिन्तक तथा देश के प्रतापी राजनीतिक थे। वह तेजस्वी पत्रकार भी थे। एक समय तक उनके पत्र ’वन्दे मातरम्‌’ ने देश के भीतरौग्र राष्ट्रीय चेतना के जागरण की दिशा में बहुत अद्‌भुत काम किया था। आज देश के जो भी वयोवद्व नेता जीवित हैं, उनके हद्वयों में ’वन्देमातरम्‌’ से ही देशभक्ति की लहर उठी थी। अरविन्द पर आतंकवादी होने का आरोप लगाकर तत्कालीन अंगरेज़ी सरकार ने उन पर मुकदमा भी चलाया था। किन्तु, उस मुकदमे में वे निर्दोष छूट गये थे। इसी बीच उनके भीतर आध्यात्मिक प्रेरणा उद्‌बुद्व हो उठीं, फलत: राजनीति को छोड़कर उनने आध्यात्मिक साधनाओं में अपने को लीन कर दिया।

महर्षि  अरविन्द के आविर्भाव का काल भारत में राष्ट्रीय चेतना के आरम्भिक संचरण का था। यूरोप के सम्पर्क से हिन्दुत्व में जो विचलन पैदा हुआ था, वह अब खत्म हो चुका था। दयानन्द और विवेकानन्द के द्वारा भारतवासियों में स्वाभिमान जगाने के प्रयास से हिन्दू अब यूरोप के सामने मस्तक झुकाने के बदले गर्व से सिर तानने लगे थे।

अरविन्द का जीवन -दर्शन संश्लिष्ट योग का दर्शन था। अर्थात्‌, परमात्मा की कृपा और मानव का प्रयास, इन दोनों के योग के बिना राष्ट्रीय चेतना का विकास नहीं होगा। उनकी यह मान्यता रही य्है कि एक-अनेक व्यक्ति यदि चाहें तो वे अपनी साधना द्वारा चित्त्‌ शक्ति को नीचे उतारने को प्रेरित या बाधित कर सकते हैं। राष्ट्रीय चेतना के विकास के सन्दर्भ में ही वह साधना द्वारा दिव्य जीवन को पृथिवी पर उतारने के लिए प्रयत्नवान्‌ थे।

स्वामी रामतीर्थ यथोक्त राष्ट्रीय चेतना की त्रिवेणी अन्तिम वेणी के रूप में परिगणनीय हैं।

वह निष्काम कर्मयोग, राजयोग, भक्तियोग एवं अद्वैत वेदान्त के विग्रहवान्‌ पुरूष थे। उनके हद्वय में देशभक्तिमूलक राष्ट्रीय चेतना और राष्ट्रहितपरक मानव-सेवा की भावना अजस्त्र रूप से प्रवाहित होती थी। उन्होंने अपने विराट्‌ व्यक्तित्व की अप्रितम गरिमा से भारत का गौरव समस्त संसार की दृष्टि में बहुत ऊँचा उठाया। राष्ट्रीय चेतना से व्याप्त उनके जीवन, साधना-प्रणाली और श्रेष्ठ आदर्शों से भारत श्रेयस्‌ और प्रेयस्‌ दोनों की प्राप्ती में समर्थ बना है। हमारे देश की युवा पीढ़ी स्वामी रामतीर्थ की राष्ट्रीय चेतना से जुड़े विचारों, उपदेशों और शिक्षाओं से प्रेरणा ग्रहण कर भारत की सच्ची राष्ट्रीय नागरिकता प्राप्त करने की शक्ति आयत्त कर सकती है।

स्वामी रामतीर्थ ने टोकियो (जापान) में सफलता का रहस्य, पर जो भाषण किया था, उससे उनकी राष्ट्रीय चेतना प्रतिध्वनित होती है। उनका मन्तव्य है कि किसी विचार को दक्षतापूर्वक कार्य रूप में परिणत करना एक बात और उसके आधारभूत मौलिक अर्थ को हद्वयगंम करना एक बिल्कुल दूसरी बात है। वर्तमान समय में चाहे कोई राष्ट कतिपय सिद्वान्तों को कार्यान्वित करता हुआ भले ही खुद फूल-फल रहा हो, किन्तु यदि राष्ट्रीय मस्तिष्क भली-भाँति उन सिद्वान्तों को समझता नहीं है। यदि उसके पीछे कोई ठोस आधार नहीं है, तो उस राष्त्र के पतन की संभावना बराबर बनी रहती है।

स्वामी रामतीर्थ पूरे विश्व को अपना मानते थे और उनका सिद्वान्त था - सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।’ ’भद्रं कर्णेभि: श्रृणुयाम, भद्रं पश्येम अक्षिभि।" इस प्रकार व्यापक राष्ट्रीय चेतना से सम्पन्न स्वामी रामतीर्थ श्री राम की तरह ही पूरे विश्व के लिए ’मंगल भवन अमंगलहारी’ थे।